आर्ट्स फैकल्टी - अर्पण कुमार

अर्पण कुमारअर्पण कुमार14 Sept 1977

2 min read · 12.3K reads

एक बड़ा सा समूह था
कुछ लोग मौक़े-बेमौक़े
खेमे बनाते चले गए
इस तरह छोटे-छोटे
कई उपसमूह हो गए

अब हमारा भी
एक उपसमूह है
लेकिन ठहरिए
यह अलगाव की नीयत से बना
कोई उप-समूह नहीं है
यह उसी बड़े से समूह का अवशेष है
जिसके कुछ लोग
किसी भी खेमे में नहीं गए।
अर्पण कुमार
About the poet

अर्पण कुमार

View profile & all 59 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like