गुरु के नाम

अनुजीत इक़बालअनुजीत इक़बाल

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छद्मवेशी संसार में

असंख्य कल्पों से तुमको ढूँढ़ रही हूँ

और तुम स्वप्न संकेतों से

इस पथभ्रष्ट स्त्री को

अपने पास बुलाते

अनंत जन्म, अनंत वेश, अनंत खेल

पांव पड़ते रहे मेरे सदैव

नित्य नए मार्गों पर

कलेवर बदल-बदलकर आत्मा विदग्धा है

जल चुकी हूँ लाखों बार चिताओं में

लेकिन दृष्टि में तुम बने रहे

अदृश्य होकर

बंधन रहित हृदय के ब्रह्मांड में

आकाशगंगा होकर

मैं क्या हूँ?

शायद तुम्हारा पुराना कमंडल

जो बार बार लगता रहा

विभिन्न मतावलंबियों के हाथ

हर नई जीवन-यात्रा में

गुरुदेव, इस जन्म-यात्रा में

तुम तक आना, जैसे

पूर्वकृत कर्मों का परिणाम और

भाग्य द्वारा निश्चित था

मेरे सब ‘प्रयत्न’ मन के भ्रम थे

‘अनायास’ तुम्हारे द्वारा नियोजित था

संसार का झींगुर रुदन

पीछे छूट रहा है और

स्वयं की स्मृति का मुक्तिद्वार

धीरे-धीरे खुल रहा है

उस ओर एकांत स्वरूपता का

मंत्रोच्चार है

तुम्हारे साथ अज्ञात भाषा के संवाद का

‘ऋचागान’ है

तुम मेरे जीवन की तपती दुपहर के

वटवृक्ष बन चुके हो

जहाँ रुककर अब चलने को

कुछ शेष नहीं बचा है

अनुजीत इक़बाल
About the poet

अनुजीत इक़बाल

सुपरिचित कवयित्री। अँग्रेज़ी में चार पुस्तकें प्रकाशित। मूल नाम : अनुजीत इक़बाल

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