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क्या मिला क़ैस को गर्द-ए-रह-ए-सहरा हो कर
क्या मिला क़ैस को गर्द-ए-रह-ए-सहरा हो कररह गया होता ग़ुबार-ए-दर-ए-लैला हो कर
किस शेर में सना-ए-रुख़-ए-मह-जबीं नहीं
किस शेर में सना-ए-रुख़-ए-मह-जबीं नहींहै आसमान-ए-हुस्न ग़ज़ल की ज़मीं नहीं
फ़ैसला क्या हो जान-ए-बिस्मिल का
फ़ैसला क्या हो जान-ए-बिस्मिल कामौत रुख़ देखती है क़ातिल का
न होगा हश्र महशर में बपा क्या
न होगा हश्र महशर में बपा क्यान होगा मेरा उन का फ़ैसला क्या
पेच दे ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं न कहीं
पेच दे ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं न कहींख़ुद उलझ जाओ ऐ हसीं न कहीं
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Kavishala has 10 poems and stories and 13 couplets (sher) by ज़ेबा, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by ज़ेबा
क्या मिला क़ैस को गर्द-ए-रह-ए-सहरा हो कर
क्या मिला क़ैस को गर्द-ए-रह-ए-सहरा हो कररह गया होता ग़ुबार-ए-दर-ए-लैला हो कर
किस शेर में सना-ए-रुख़-ए-मह-जबीं नहीं
किस शेर में सना-ए-रुख़-ए-मह-जबीं नहींहै आसमान-ए-हुस्न ग़ज़ल की ज़मीं नहीं
फ़ैसला क्या हो जान-ए-बिस्मिल का
फ़ैसला क्या हो जान-ए-बिस्मिल कामौत रुख़ देखती है क़ातिल का
न होगा हश्र महशर में बपा क्या
न होगा हश्र महशर में बपा क्यान होगा मेरा उन का फ़ैसला क्या
पेच दे ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं न कहीं
पेच दे ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं न कहींख़ुद उलझ जाओ ऐ हसीं न कहीं
ऐसी तश्बीह फ़क़त हुस्न की बदनामी है
ऐसी तश्बीह फ़क़त हुस्न की बदनामी हैमाह आरिज़ को लिखा ख़ामे की ये ख़ामी है
फ़िराक़ में ख़ून-ए-दिल हैं पीते शराब हम ले के क्या करेंगे
फ़िराक़ में ख़ून-ए-दिल हैं पीते शराब हम ले के क्या करेंगेहमारा दिल आप भुन रहा है कबाब हम ले के क्या करेंगे
जफ़ा-पसंदों को सुनते हैं ना-पसंद हुआ
जफ़ा-पसंदों को सुनते हैं ना-पसंद हुआअब और भी दिल-ए-मायूस दर्द-मंद हुआ
क्यूँ हो न गिर के कासा-ए-तदबीर पाश पाश
क्यूँ हो न गिर के कासा-ए-तदबीर पाश पाशहै संग-ए-ग़म से शीशा-ए-तक़दीर पाश पाश
ज़ेबा के शेर
हुआ है इश्क़ में कम हुस्न-ए-इत्तिफ़ाक़ ऐसाकि दिल को यार तो दिल यार को पसंद हुआ
Selected Quotes by ज़ेबा (चुनिंदा उद्धरण)
हुआ है इश्क़ में कम हुस्न-ए-इत्तिफ़ाक़ ऐसा कि दिल को यार तो दिल यार को पसंद हुआपहले क्या था जो किया करते थे तारीफ़ मिरी अब हुआ क्या जो बुरा हो गया अच्छा हो करआप को खो के तुम को ढूँढ लिया हौसला था ये मेरे ही दिल कानहीं है फ़ुर्सत यहीं के झगड़ों से फ़िक्र-ए-उक़्बा कहाँ की वाइ'ज़ अज़ाब-ए-दुनिया है हम को क्या कम सवाब हम ले के क्या करेंगेख़ुदा की भी नहीं सुनते हैं ये बुत भला मैं क्या हूँ मेरी इल्तिजा क्याजिस्म-ए-अनवर की लताफ़त की सना क्या कीजे जामा-ए-यार न उतरा कभी मैला हो करCouplets (Sher) by ज़ेबा
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