विमलेश कान्ति वर्मा, poet
Sootradhar · Author

विमलेश कान्ति वर्मा

विमलेश कान्ति वर्मा

4 July 1943इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश

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About विमलेश कान्ति वर्मा

लब्धप्रतिष्ठ भाषावैज्ञानिक, वरिष्ठ प्रवासी साहित्य विशेषज्ञ जन्म: १९४३, इलाहाबाद, शिक्षा: एम. ए., डी.फिल. हिंदी (इलाहाबाद) व एम.लिट. भाषाविज्ञान (दिल्ली), ऍफ़.आर.ए.एस. (लंदन) अनुभव: दिल्ली विश्वविद्यालय में पाँच दशकों से भी अधिक समय तक स्नातक तथा स्नातकोत्तर स्तर पर हिन्दी भाषा और साहित्य का अध्यापन (१९६५-२०१६ ) टोरोंट…

Selected Quotes

इन दोनों भावों में डूबता उतराता मानव प्रवास का निश्चय करता है।
— विमलेश कान्ति वर्मा
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Poetry & Stories

  1. फीजी का सृजनात्मक हिंदी साहित्य | विमलेश कान्ति वर्मा

    फीजी के सृजनात्मक हिंदी साहित्य का इतिहास लगभग सवा सौ वर्षों का है और यह साहित्य प्रधानतः भारतीयों के फीजी आगमन, उनके संघर्ष और विकास का दस्तावेज़ कहा जा सकता है। फीजी के सृजनात्मक हिंदी साहित्य की मूल संवेदना प्रवास की पीड़ा है जो साहित्य में आद्यन्त देखने को मिलेगी यद्यपि उसका स्वरूप विविध सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के कारण बदलता हुआ दिखता है। प्रवास में जहाँ व्यक्ति के मन में एक ओर नई जगह जाने का उत्साह है, चुनौती है, नई आशाएँ और कामनाएँ हैं वहीं दूसरी ओर विछोह की पीड़ा है, विस्थापन का कष्ट है और भविष्य की आशंकाएँ हैं। इन दोनों भावों में डूबता उतराता मानव प्रवास का निश्चय करता है। अपनों का विछोह, अपनी मिट्टी का विछोह प्रवासी के मन में एक गहरी कसक उत्पन्न करता है। इस कसक को व्यक्ति नए सुखमय भविष्य की आशा में भुलाने की चेष्टा करता है। यदि नया वातावरण अधिक सुख सुविधा सम्पन्न है तो प्रवासी धीरे-धीरे नए वातावरण में रम जाता है और विछोह की पीड़ा धीरे-धीरे कम होती जाती है। वहीं दूसरी ओर यदि प्रवास वह वातावरण नहीं दे पाता जिस आशा से व्यक्ति अपना घर-बार छोड़कर विदेश गया है तो प्रवास बड़ा कष्टकर लगता है, उसका मन क्षोभ और ग्लानि से भर जाता है। न वह वापस अपने देश जा सकता है और न ही उसका मन यहाँ लगता है।फीजी के सृजनात्मक हिंदी साहित्य को हम तीन काल खण्डों में बाँटकर देख सकते हैं। ये काल खण्ड फीजी में भारतीयों के संघर्षमय जीवन के मुख्य पड़ाव हैं और इनमें हम भारतीयों की सृजनात्मक साहित्यिक अभिव्यक्ति के विशिष्ट मोड़ों को भी देख सकते हैं।

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