About तारिक़ क़मर
मूल नाम : तारिक़ क़मर जन्म : 01 Jul 1975 | संभल, उत्तर प्रदेश LCCN : n2012215944
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About तारिक़ क़मर
मूल नाम : तारिक़ क़मर
जन्म : 01 Jul 1975 | संभल, उत्तर प्रदेश
LCCN :n2012215944
तारिक़ क़मर: Quick Answers
Who is तारिक़ क़मर?
मूल नाम : तारिक़ क़मर जन्म : 01 Jul 1975 | संभल, उत्तर प्रदेश LCCN : n2012215944
When was तारिक़ क़मर born?
तारिक़ क़मर was born on 1 July 1975. Associated place: लखनऊ, भारत.
Where can I read तारिक़ क़मर's poetry?
Kavishala has 22 couplets (sher) by तारिक़ क़मर, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by तारिक़ क़मर
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Selected Quotes by तारिक़ क़मर (चुनिंदा उद्धरण)
अभी बाक़ी है बिछड़ना उस से ना-मुकम्मल ये कहानी है अभीकोई शिकवा न शिकायत न वज़ाहत कोई मेज़ से बस मिरी तस्वीर हटा दी उस नेज़ेहन पर बोझ रहा, दिल भी परेशान हुआ इन बड़े लोगों से मिल कर बड़ा नुक़सान हुआइस सलीक़े से मुझे क़त्ल किया है उस ने अब भी दुनिया ये समझती है कि ज़िंदा हूँ मैंहर आदमी वहाँ मसरूफ़ क़हक़हों में था ये आँसुओं की कहानी किसे सुनाते हमअजब ग़रीबी के आलम में मर गया इक शख़्स कि सर पे ताज था दामन में इक दुआ भी न थीCouplets (Sher) by तारिक़ क़मर
अभी बाक़ी है बिछड़ना उस से ना-मुकम्मल ये कहानी है अभीकोई शिकवा न शिकायत न वज़ाहत कोई मेज़ से बस मिरी तस्वीर हटा दी उस नेज़ेहन पर बोझ रहा, दिल भी परेशान हुआ इन बड़े लोगों से मिल कर बड़ा नुक़सान हुआइस सलीक़े से मुझे क़त्ल किया है उस ने अब भी दुनिया ये समझती है कि ज़िंदा हूँ मैंहर आदमी वहाँ मसरूफ़ क़हक़हों में था ये आँसुओं की कहानी किसे सुनाते हमअजब ग़रीबी के आलम में मर गया इक शख़्स कि सर पे ताज था दामन में इक दुआ भी न थीमिज़ाज अपना मिला ही नहीं ज़माने से न मैं हुआ कभी इस का न ये ज़माना मिरावो भी रस्मन यही पूछेगा कि कैसे हो तुम मैं भी हँसते हुए कह दूँगा कि अच्छा हूँ मैंक्या अजब लोग थे गुज़रे हैं बड़ी शान के साथ रास्ते चुप हैं मगर नक़्श-ए-क़दम बोलते हैंसाथ होने के यक़ीं में भी मिरे साथ हो तुम और न होने के भी इम्कान में रक्खा है तुम्हेंकैसे रिश्तों को समेटें ये बिखरते हुए लोग टूट जाते हैं यही फ़ैसला करते हुए लोगवो लोग भी तो किनारों पे आ के डूब गए जो कह रहे थे समुंदर हैं सब खंगाले हुएमैं चाहता हूँ कभी यूँ भी हो कि मेरी तरह वो मुझ को ढूँडने निकले मगर न पाए मुझेमेरे ज़ख़्मों का सबब पूछेगी दुनिया तुम से मैं ने हर ज़ख़्म की पहचान में रक्खा है तुम्हेंकिसी जवाज़ का होना ही क्या ज़रूरी है अगर वो छोड़ना चाहे तो छोड़ जाए मुझेएक मुद्दत से ये मंज़र नहीं बदला 'तारिक़' वक़्त उस पार है ठहरा हुआ इस पार हैं हमफिर आज भूक हमारा शिकार कर लेगी कि रात हो गई दरिया में जाल डाले हुएइस लहजे से बात नहीं बन पाएगी तलवारों से कैसे काँटे निकलेंगेये किस की प्यास के छींटे पड़े हैं पानी पर ये कौन जब्र का क़िस्सा तमाम कर आयाजैसे मुमकिन हो इन अश्कों को बचाओ 'तारिक़' शाम आई तो चराग़ों की ज़रूरत होगीहम उस को सारी उम्र उठाए फिरा किए जो बार 'मीर' से भी उठाया न जा सकाअपनी पलकों के शबिस्तान में रक्खा है तुम्हें तुम सहीफ़ा हो सो जुज़दान में रक्खा है तुम्हें
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