असली जिन

Saadat Hasan MantoSaadat Hasan Manto11 May 1912

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लखनऊ के पहले दिनों की याद नवाब नवाज़िश अली अल्लाह को प्यारे हुए तो उन की इकलौती लड़की की उम्र ज़्यादा से ज़्यादा आठ बरस थी। इकहरे जिस्म की, बड़ी दुबली पतली, नाज़ुक, पतले पतले नक़्शों वाली। गुड़िया सी। नाम उस का फ़र्ख़ंदा था।

उस को अपने वालिद की मौत का दुख हुआ। मगर उम्र ऐसी थी कि बहुत जल्द भूल गई। लेकिन उस को अपने दुख का शदीद एहसास उस वक़्त हुआ जब उस को मीठा बरस लगा और उस की माँ ने उस का बाहर आना जाना क़तई तौर पर बंद कर दिया और उस पर कड़े पर्दे की पाबंदी आइद कर दी। उस को अब हर वक़्त घर की चार दीवारी में रहना पड़ता। उस का कोई भाई था न बहन। अक्सर तन्हाई में रोती और ख़ुदा से ये गिला करती कि उस ने भाई से उसे क्यों महरूम रख्खा और फिर उस का अब्बा मियां उस से क्यों छीन लिया।

माँ से उस को मुहब्बत थी, मगर हर वक़्त उस के पास बैठी वो कोई तसकीन महसूस नहीं करती थी। वो चाहती थी कोई और हो जिस के वजूद से उस की ज़िंदगी की यक आहंगी दूर हो सके।

वो हर वक़्त उकताई उकताई सी रहती। अब उस को अठारवां बरस लग रहा था। सालगिरा में दस बारह रोज़ बाक़ी थे कि पड़ोस का मकान जो कुछ देर से ख़ाली पड़ा था पंजाबियों के एक ख़ानदान ने किराए पर उठा लिया। उन के आठ लड़के थे और एक लड़की। आठ लड़कों में से दो बियाहे जा चुके थे। बाक़ी स्कूल और कॉलिज में पढ़ते थे। लड़की इन छयों से एक बरस बड़ी थी। बड़ी तनोमंद, हट्टी कट्टी, अपनी उम्र से दो अढ़ाई बरस ज़्यादा ही दिखाई देती थी। ऐंटरैंस पास कर चुकी थी इस के बाद उस के वालिदेन ने ये मुनासिब न समझा था कि उसे मज़ीद तालीम दी जाये। मालूम नहीं क्यों?

उस लड़की का नाम नसीमा था। लेकिन अपने नाम की रियायत से वो नरम-ओ-नाज़ुक और सुस्त रफ़्तार नहीं थी। उस में बला की फुर्ती और गर्मी थी फ़र्ख़ंदा को इस महीन महीन मोंछों वाली लड़की ने कोठे पर से देखा, जब कि वो बेहद उकता कर कोई नावेल पढ़ने की कोशिश करना चाहती थी।

दोनों कोठे साथ साथ थे चुनांचे चंद जुमलों ही में दोनों मुतआरिफ़ होगईं।

फ़र्ख़ंदा को उस की शक्ल-ओ-सूरत पहली नज़र में क़तअन पुर-कशिश मालूम न हुई लेकिन जब उस से थोड़ी देर गुफ़्तुगू हुई तो उसे उस का हर ख़ुद्द-ओ-ख़ाल पसंद आया। मोटे मोटे नक़्शों वाली थी, जैसे कोई जवान लड़का है। जिस की मसें भीग रही हैं। बड़ी सेहत मंद भरे भरे हाथ पांव। कुशादा सीना मगर उभारों से बहुत हद तक ख़ाली। फ़र्ख़ंदा को उस के बालाई लब पर महीन महीन बालों का गुबार खासतौर पर बहुत पसंद आया। चुनांचे उन में फ़ौरन दोस्ती होगई।

नसीमा ने उस के हाथ में किताब देखी तो पूछा “ये नावsल कैसा है?”

फ़र्ख़ंदा ने कहा “बड़ा ज़लील क़िस्म का है ऐसे ही मिल गया था। मैं तन्हाई से घबरा गई थी। सोचा कि चंद सफ़े पढ़ लूँ।”

नसीमा ने ये नावैल फ़र्ख़ंदा से लिया वाक़ई बड़ा घटिया सा था। मगर उस ने रात को बहुत देर जाग कर पढ़ा। सुबह नौकर के हाथ फ़र्ख़ंदा को वापस भेज दिया। वो अभी तक तन्हाई महसूस कर रही थी और कोई काम नहीं था। इस लिए उस ने सोचा कि चलो चंद औराक़ देख लूं। किताब खोली तो उस में से एक रुका निकला जो उस के नाम था। ये नसीमा का लिखा हुआ था।

उसे पढ़ते हुए फ़र्ख़ंदा के तन बदन में कपकपियाँ दौड़ती रहीं। फ़ौरन कोठे पर गई। नसीमा ने उस से कहा था कि अगर वो उसे बुलाना चाहे तो ईंट जो मुंडेर से उखड़ी हुई थी ज़ोर ज़ोर से किसी और ईंट के साथ बजा दिया करे। वो फ़ौरन आ जाएगी।

फ़र्ख़ंदा ने ईंट बजाई तो नसीमा सचमुच एक मिनट में कोठे पर आगई। शायद वो अपने रुके के जवाब का इंतिज़ार कर रही थी आते ही वो चार साढ़े चार फ़ुट की की मुंडेर पर मर्दाना अंदाज़ में चढ़ी और दूसरी तरफ़ कूद कर फ़र्ख़ंदा से लिपट गई और चट से इस के होंटों का तूल बोसा ले लिया।

फ़र्ख़ंदा बहुत ख़ुश हुई। देर तक दोनों गुल मिल के बातें करती रहें। नसीमा अब उसे और ज़्यादा ख़ूबसूरत दिखाई दी। उस की हर अदा जो मर्दाना तर्ज़ की थी इसे बेहद पसंद आई और वहीं फ़ैसला होगया कि वो ता-दम-ए-आख़िर सहेलियां बनी रहेंगी।

सालगिरा का दिन आया तो फ़र्ख़ंदा ने अपनी माँ से इजाज़त तलब की कि वो अपनी हम-साई को जो उस की सहेली बन चुकी है बुला सकती है उस ने अपने ठेट लखनवी अंदाज़ में कहा “कोई मज़ाइक़ा नहीं बुला लो लेकिन वो मुझे पसंद नहीं। मैंने देखा है लौंडों की तरह कद कड़े लगाती रहती है।”

फ़र्ख़ंदा ने वकालत की “नहीं अम्मी जान वो तो बहुत अच्छी है। जब मिलती है बड़े अख़लाक़ से पेश आती है”

नवाब साहिब की बेगम ने कहा “होगा, मगर भई मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि उस में लड़कियों की कोई नज़ाकत नहीं। लेकिन तुम इसरार करती हो तो बुला लो। लेकिन उस से ज़्यादा रब्त नहीं होना चाहिए।”

फ़र्ख़ंदा अपनी माँ के पास तख़्त पर बैठ गई और उस के हाथ से सरोता ले कर छालिया काटने लगी। “लेकिन अम्मी जान हम दोनों तो कसम खा चुकी हैं कि सारी उम्र सहेलियां रहेंगी इंसान को अपने वाअदे से कभी फिरना नहीं चाहिए”

बेगम साहिबा उसूल की पक्की थीं इस लिए उन्हों ने कोई एतराज़ न किया और सिर्फ़ ये कह कर ख़ामोश हो गईं “तुम जानो मुझे कुछ मालूम नहीं”

सालगिरा के दिन नसीमा आई। उस की क़मीस धारीदार पोपलीन की थी। चुस्त पाएजामा जिस में से उस की मज़बूत पिंडलियां अपनी तमाम मज़बूती दिखा रही थीं। फ़र्ख़ंदा को वो इस लिबास में बहुत प्यारी लगी। चुनांचे उस ने अपनी तमाम निस्वानी नज़ाकतों के साथ उस का इस्तिक़बाल किया और उस से चंद नाज़ नख़रे भी किए। मिसाल के तौर पर जब मेज़ पर चाय आई तो उस ने ख़ुद बना कर नसीमा को पेश की। उस ने कहा मैं नहीं पीती, तो फ़र्ख़ंदा रोने लगी। बिस्कुट अपने दाँतों से तोड़ा तो उस को मजबूर किया कि वो इस का बक़ाया हिस्सा खाए। समोसा मुँह में रखा तो उस से कहा कि वो आधा इस के मुँह के साथ मुँह लगा कर खाए।

एक आध मर्तबा मामूली मामूली बातों पर लड़ाई होते होते रह गई, मगर फ़र्ख़ंदा ख़ुश थी। वो चाहती थी कि नसीमा हर रोज़ आए। वो उस से चहल करे और ऐसी नरम-ओ-नाज़ुक लड़ाईयां होती रहीं जिन से उस की ठहरे पानी ऐसी ज़िंदगी में चंद लहरें पैदा होती रहीं। लहरें पैदा होना शुरू होगईं।

और उन में फ़र्ख़ंदा और नसीमा दोनों लहराने लगीं। अब फ़र्ख़ंदा ने भी अपनी अम्मी से इजाज़त लेकर नसीमा के घर जाना शुरू कर दिया। दोनों उस कमरे में जो नसीमा का था दरवाज़े बंद कर के घंटों बैठी रहतीं। जाने क्या बातें करती थीं?

उन की मुहब्बत इतनी शिद्दत इख़्तियार कर गई कि फ़र्ख़ंदा जब कोई चीज़ खरीदती तो नसीमा का ज़रूर ख़याल रखती। उस की अम्मी इस के ख़िलाफ़ थी। चूँकि इकलौती थी इस लिए वो उसे रंजीदा नहीं करना चाहती थी। दौलत काफ़ी थी इस लिए क्या फ़र्क़ पड़ता था कि एक के बजाय दो क़मीसों के लिए कपड़ा ख़रीद लिया जाये। फ़र्ख़ंदा की दस शलवारों के लिए सफ़ैद साटन ली तो नसीमा के लिए पाँच शलवारों के लिए लट्ठा ले लिया जाये।

नसीमा को रेशमी मलबूस पसंद नहीं थे। उस को सूती कपड़े पहनने की आदत थी। वो फ़र्ख़ंदा से ये तमाम चीज़ें लेती मगर शुक्रिया अदा करने की ज़रूरत महसूस न करती। सिर्फ़ मुस्कुरा देती और ये तोहफ़े तहाइफ़ वसूल कर के फ़र्ख़ंदा को अपनी बाँहों की मज़बूत गिरिफ़त में भींच लेती और उस से कहती “”मेरे माँ बाप ग़रीब हैं। अगर न होते तो में तुम्हारे ख़ूबसूरत बालों में हर रोज़ अपने हाथों से सोने की कंघी करती। तुम्हारी सैंडलें चांदी की होतीं। तुम्हारे ग़ुसल के लिए मुअत्तर पानी होता। तुम्हारी बाँहों में मेरी बांहें होतीं और हम जन्नत की तमाम मंज़िलें तय कर के दोज़ख़ के दहाने तक पहुंच जाते।”

मालूम नहीं वो जन्नत से जहन्नम तक क्यों पहुंचना चाहती थी। वो जब भी फ़िर्दोस का ज़िक्र करती तो दोज़ख़ का ज़िक्र ज़रूर आता। फ़र्ख़ंदा को शुरू शुरू में थोड़ी सी हैरत उस के मुतअल्लिक़ ज़रूर हुई मगर बाद में जब वो नसीमा से घुल मिल गई तो उस ने महसूस किया कि इन दोनों में कोई ज़्यादा फ़र्क़ नहीं। सर्दी से निकल अगर आदमी गर्मी में जाये तो उसे हर लिहाज़ से राहत मिलती है और फ़र्ख़ंदा को ये हासिल होती थी। उन की दोस्ती दिन ब-दिन ज़्यादा उस्तुवार होती गई बल्कि यूं कहिए कि बड़ी शिद्दत इख़्तियार कर गई जो नवाब नवाज़िश अली मरहूम की बेगम को बहुत खलती थी। बाअज़ औक़ात वो ये महसूस करती कि नसीमा उस की मौत है। लेकिन ये एहसास उस को बा-वक़ार मालूम न होता।

फ़र्ख़ंदा अब ज़्यादा तर नसीमा ही के पास रहती। सुबह उठ कर कोठे पर जाती। नसीमा उसे उठा कर मुंडेर के उस तरफ़ ले जाती और दोनों कमरे में बंद घंटों जाने किन बातों में मशग़ूल रहतीं।

फ़र्ख़ंदा की दो सहेलियां और भी थीं, बड़ी मुर्दार क़िस्म की। यू पी की रहने वाली थीं। जिस्म छीछड़ा सा। दोपली टोपियां सी मालूम होती थीं। फूंक मॉरो तो उड़ जाएं।

नसीमा से तआरुफ़ होने से पहले ये दोनों उस की जान-ओ-जिगर थीं मगर अब फ़र्ख़ंदा को उन से कोई लगाओ नहीं रहा था। बल्कि चाहती थी कि वो न आया करें इस लिए कि इन में कोई जान नहीं थी। नसीमा के मुक़ाबले में वो नन्ही नन्ही चूहियां थीं जो कुतरना भी नहीं जानतीं।

एक बार उसे मजबूरन अपनी माँ के साथ कराची जाना पड़ा वो भी फ़ौरी तौर पर नसीमा घर में मौजूद नहीं थी इस का फ़र्ख़ंदा को बहुत अफ़सोस हुआ। चुनांचे कराची पहुंचते ही उस ने उस को एक तवील माज़रत नामा लिखा। इस से पहले वो तार भेज चुकी थी। उस ने ख़त में सारे हालात दर्ज कर दिए और लिखा कि तुम्हारे बग़ैर मेरी ज़िंदगी यहां बे-कैफ़ है। काश तुम भी मेरे साथ आतीं।

उस की वालिदा को कराची में बहुत काम थे। मगर उस ने उसे कुछ भी न करने दिया। दिन में कम-अज़-कम सौ मर्तबा कहती “मैं उदास होगई हूँ। ये भी कोई शहरों में शहर है। यहां का पानी पी कर मेरा हाज़मा ख़राब होगया है अपना काम जल्दी ख़त्म कीजिए और चलिए लाहौर”

नवाब नवाज़िश अली की बेगम ने सारे काम अधूरे छोड़े और वापस चलने पर रज़ामंद होगई। मगर अब फ़र्ख़ंदा ने कहा “जाना है तो ज़रा शॉपिंग कर लें यहां कपड़ा और दूसरी चीज़ें सस्ती और अच्छी मिलती हैं”

शॉपिंग हुई। फ़र्ख़ंदा ने अपनी सहेली नसीमा के दस सलेक्स के लिए बेहतरीन डिज़ाइन का कपड़ा ख़रीदा। वाकिंग शू लिए। एक घड़ी ख़रीदी जो नसीमा की चौड़ी कलाई के लिए मुनासिब-ओ-मौज़ूं थी माँ ख़ामोश रही कि वो नाराज़ न हो जाये।

कराची से लाहौर पहुंची तो सफ़र की थकान के बावजूद फ़ौरन नसीमा से मिली मगर उस का मुँह सूझा हुआ था। सख़्त नाराज़ थी कि वो उस से मिले बग़ैर चली गई। फ़र्ख़ंदा ने बड़ी माफियां मांगीं। हर सतह से उस की दिलजोई की मगर वो राज़ी न हुई इस पर फ़र्ख़ंदा ने ज़ारो क़तार रोना शुरू कर दिया और नसीमा से कहा कि “अगर वो इसी तरह नाराज़ रही तो वो कुछ खा कर मर जाएगी।” इस का फ़ौरी असर हुआ और नसीमा ने उस को अपने मज़बूत बाज़ूओं में समेत लिया और उस को चूमने पुचकारने लगी।

देर तक दोनों सहेलियां कमरा बंद कर के बैठी प्यार मुहब्बत की बातें करती रहीं। उस दिन के बाद उन की दोस्ती और ज़्यादा मज़बूत होगई। मगर फ़र्ख़ंदा की माँ ने महसूस किया कि उस की इकलौती बेटी की सेहत दिन बदिन ख़राब हो रही है। चुनांचे उस ने इस का घर से निकलना बंद कर दिया। इस का नतीजा ये हुआ कि फ़र्ख़ंदा पर हिस्टेरिया ऐसे दौरे पड़ने लगे।

बेगम साहिबा ने अपनी जान पहचान वाली औरतों से मश्वरा किया तो उन्हों ने ये अंदेशा ज़ाहिर किया कि लड़की को आसीब होगया है। दूसरे लफ़्ज़ों में कोई जिन्न इस पर आशिक़ है जो इस को नहीं छोड़ता। चुनांचे फ़ौरन टोने टोटके किए गए। झाड़ फूंक करने वाले बुलाए गए। तावीज़ गंडे हुए मगर बे-सूद।

फ़र्ख़ंदा की हालत दिन बदिन ग़ैर होती गई। कुछ समझ में नहीं आता था कि आरिज़ा किया है। दिन बदिन दुबली हो रही थी। कभी घंटों ख़ामोश रहती। कभी ज़ोर ज़ोर से चिल्लाना शुरू कर देती और अपनी सहेली नसीमा को याद कर के पहरों आँसू बहाती।

उस की माँ जो ज़्यादा ज़ईफ़-उल-एतिका़द नहीं थी। अपनी जान पहचान की औरतों की इस बात पर यक़ीन हुआ कि लड़की पर कोई जिन्न आशिक़ है। इस लिए कि फ़र्ख़ंदा इशक़-ओ-मुहब्बत की बहुत ज़्यादा बातें करती थी और बड़े ठंडे ठंडे सांस भर्ती थी।

एक मर्तबा फिर कोशिश की गई। बड़ी दूर दूर से झाड़ने वाले बुलाए गए दवा दारू भी किया मगर कोई फ़ायदा न हुआ। फ़र्ख़ंदा बार बार इल्तिजा करती कि उस की सहेली नसीमा को बुलाया जाये मगर उस की माँ टालती रही।

आख़िर एक रोज़ फ़र्ख़ंदा की हालत बहुत बिगड़ गई। घर में कोई भी नहीं था। उस की वालिदा जो कभी बाहर नहीं निकली थी बुर्क़ा ओढ़ कर एक हमसाई के हाँ गई और उस से कहा कि कुछ करे। दोनों भागम भाग फ़र्ख़ंदा के कमरे में पहुंचीं मगर वो मौजूद नहीं थी।

नवाब नवाज़िश अली मरहूम की बेगम ने चीख़ना चिल्लाना और दीवाना वार “फ़र्ख़ंदा बेटी, फ़र्ख़ंदा बेटी” कह कर पुकारना शुरू कर दिया। सारा घर छान मारा मगर वो न मिली इस पर वो अपने बाल नोचने लगी। हम-साई ने उस के हाथ पकड़ लिए मगर वो बराबर वावेला करती रही।

फ़र्ख़ंदा नीम दीवानगी के आलम में ऊपर कोठे पर खड़ी थी। उस ने मुंडेर की उखड़ी हुई ईंट उठाई और ज़ोर ज़ोर से उसे दूसरी ईंट के साथ बजाया।

कोई न आया।

उस ने फिर ईंट को दूसरी ईंट के साथ टकराया। चंद लम्हात के बाद एक ख़ूबसूरत नौ-जवान जो नसीमा के छः कुंवारे भाईयों में से सब से बड़ा था और बरसाती में बैठा बी ए के इम्तिहान की तैय्यार कर रहा था बाहर निकला उस ने देखा मुंडेर के उस तरफ़ एक दुबली पत्ती नाज़ुक इंदाम लड़की खड़ी है। बड़ी परेशान हाल बाल खुले हैं। होंटों पर पीढ़ियां जमी हैं।

आँखों में सैंकड़ों ज़ख़्मी उमंगें सिमटी हैं।

क़रीब आकर उस ने फ़र्ख़ंदा से पूछा “किसे बुला रही हैं आप”

फ़र्ख़ंदा ने इस नौजवान को बड़े गहरे और दिलचस्प ग़ौर से देखा “मैं नसीमा को बुला रही थी”

नौजवान ने सिर्फ़ इतना कहा “ओह चलो आओ!” और ये कह कर मुंडेर के इस तरफ़ से हल्की फुल्की फ़र्ख़ंदा को उठाया और बरसाती में ले गया जहां वो इम्तिहान की तैय्यारी कर रहा था।

दूसरे दिन जिन ग़ायब हो गया। फ़र्ख़ंदा बिलकुल ठीक थी। अगले महीने उस की शादी नसीमा के इस भाई से हो गई जिस में नसीमा शरीक न हुई।

(२६ मई १९५४-ई-)

Saadat Hasan Manto
About the poet

Saadat Hasan Manto

Saadat Hasan Manto (/mɑːn, -tɒ/; Urdu: سعادت حسن منٹو‎, pronounced [səˈaːd̪ət̪ ˈɦəsən ˈməɳʈoː]; 11 May 1912 – 18 January 1955) was a Pakistani writer, playwright and author born in Ludhiana, British India. Writing mainly in the Urdu language, he produced 22 c…

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    <br />ये 1919 ईस्वी की बात है, भाईजान, जब रौलेट ऐक्ट के ख़िलाफ़ सारे पंजाब में एजीटेशन हो रहा था। मैं अमृतसर की बात कर रहा हूँ। सर माईकल ओडवायर ने डिफ़ेन्स ऑफ़ इण्डिया रूल्ज़ के मातहत गांधी जी का दाख़िला पंजाब में बन्द कर दिया था। वो इधर आ रहे थे कि पलवाल के मुक़ाम पर उनको रोक लिया गया और गिरफ़्तार करके वापस बम्बई भेज दिया गया। जहाँ तक में समझता हूँ, भाईजान, अगर अँग्रेज़ ये ग़लती न करता तो जलियाँवाला बाग़ का हादसा उस की हुक्मरानी की स्याह तारीख़ में ऐसे ख़ूनीं वर्क़ का इज़ाफ़ा कभी न करता।<br />क्या मुसलमान, क्या हिन्दू, क्या सिख, सब के दिल में गांधी जी की बेहद इज़्ज़त थी। सब उन्हें महात्मा मानते थे। जब उन की गिरफ़्तारी की ख़बर लाहौर पहुँची तो सारा कारोबार एकदम बन्द हो गया। यहाँ से अमृतसर वालों को मालूम हुआ, चुनाँचे यूँ चुटकियों में मुकम्मल हड़ताल हो गई।<br />कहते हैं कि नौ अप्रैल की शाम को डाक्टर सत्यपाल और डाक्टर किचलू की ज़िलावतनी के आर्डर डिप्टी कमिशनर को मिल गए थे। वो उन की तामील के लिए तैयार नहीं था क्योंकि उसके ख़्याल के मुताबिक़ अमृतसर में किसी हैजान-ख़ेज बात का ख़तरा नहीं था। लोग पुरअम्न तरीक़े से एहितजाजी जलसे वग़ैरा करते थे। जिनसे तशद्दुद का सवाल ही पैदा नहीं होता था। मैं अपनी आँखों देखा हाल बयान करता हूँ। नौ को रामनवमी थी।। जलूस निकला मगर मजाल है जो किसी ने हुक्काम की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ एक क़दम उठाया हो, लेकिन भाईजान, सर माईकल अजब औंधी खोपड़ी का इनसान था। उस ने डिप्टी कमिशनर की एक ना सुनी। उस पर, बस, यही ख़ौफ़ सवार था कि ये लीडर महात्मा गांधी के इशारे पर सामराज का तख़्ता उलटने के दर पे हैं और जो हड़तालें हो रही हैं और जलसे मुनअक़िद होते हैं उनके पस-ए-पर्दा यही साज़िश काम कर रही है।<br />डाक्टर किचलू और डाक्टर सत्यपाल की ज़िलावतनी की ख़बर आनन-फ़ानन शहर में आग की तरह फैल गई। दिल हर शख़्स का मुकद्दर था। हर वक़्त धड़का-सा लगा रहता था कि कोई बहुत बड़ा हादिसा बरपा होने वाला है, लेकिन, भाईजान, जोश बहुत ज़्यादा था। कारोबार बन्द थे। शहर क़ब्रिस्तान बना हुआ था, पर इस क़ब्रिस्तान की ख़ामोशी में भी एक शोर था। जब डाक्टर किचलू और सत्यपाल की गिरफ़्तारी की ख़बर आई तो लोग हज़ारों की तादाद में इकट्ठे हुए कि मिलकर डिप्टी कमिशनर बहादुर के पास जाएँ और अपने महबूब लीडरों की जिलावतनी के अहकाम मंसूख़ कराने की दरख़ास्त करें। मगर वो ज़माना, भाईजान, दरख़ास्तें सुनने का नहीं था। सर माईकल जैसा फ़िरऔन हाकिम-ए-आला था। उसने दरख़ास्त सुनना तो कुजा लोगों के इस इजतिमा ही को ग़ैरक़ानूनी क़रार दिया।<br />अमृतसर.......वो अमृतसर जो कभी आज़ादी की तहरीक का सब से बड़ा मर्कज़ था, जिस के सीने पर जलियाँवाला बाग़ जैसा क़ाबिल-ए-फ़ख़्रज़ख़्म था, आज किस हालत में है?.......लेकिन छोड़िए इस क़िस्से को। दिल को बहुत दुख होता है। लोग कहते हैं कि इस मुक़द्दस शहर में जो कुछ आज से पाँच बरस पहले हुआ उस के ज़िम्मेदार भी अँग्रेज़ हैं। होगा भाईजान, पर सच्च पूछिए तो इस लहू में, जो वहाँ बहा है, हमारे अपने ही हाथ रंगे हुए नज़र आते हैं। ख़ैर !.......<br />डिप्टी कमिशनर साहब का बंगला सिविल लाइन्स में था। हर बड़ा अफ़सर और हर बड़ा टोडी शहर के इस अलग-थलग हिस्से में रहता था.... आप ने अमृतसर देखा है तो आप को मालूम होगा कि शहर और सिविल लाइन्स को मिलाने वाला एक पुल है जिसपर से गुज़रकर आदमी ठण्डी सड़क पर पहुँचता है। जहाँ हाकिमों ने अपने लिए ये अर्ज़ी जन्नत बनाई हुई थी।<br />हुजूम जब हाल दरवाज़े के क़रीब पहुँचा तो मालूम हुआ कि पुल पर घुड़सवार गोरों का पहरा है। हुजूम बिलकुल न रूका और बढ़ता गया। भाईजान, मैं इसमें शामिल था। जोश कितना था, मैं बयान नहीं कर सकता, लेकिन सब निहत्थे थे। किसी के पास एक मामूली छड़ी तक भी नहीं थी। असल में वो तो सिर्फ़ इस ग़रज़ से निकले थे कि इजतिमाई तौर पर अपनी आवाज़ हाकिम-ए-शहर तक पहुँचाएँ और उस से दरख़ास्त करें कि डाक्टर किचलू और डाक्टर सत्यपाल को ग़ैर मशरूत तौर पर रिहा कर दे। हुजूम पुल की तरफ़ बढ़ता रहा। लोग क़रीब पहुँचे तो गोरों ने फ़ायर शुरू कर दिए। इससे भगदड़ मच गई। वो गिनती में सिर्फ़ बीस-पच्चीस थे और हुजूम सैंकड़ों पर मुश्तमिल था, लेकिन, भाई, गोली की दहश्त बहुत होती है। ऐसीअफ़रा-तफ़री फैली कि अलामां, कुछ गोलियों से घायल हुए और कुछ भगदड़ में ज़ख़्मी हुए।<br />दाएँ हाथ को गन्दा नाला था। धक्का लगा तो मैं उस में गिर पड़ा। गोलियाँ चलनी बन्द हुईं तो मैंने उठ कर देखा। हुजूम तितर बितर हो चुका था।ज़ख़्मी सड़क पर पड़े थे और पुल पर गोरे खड़े हँस रहे थे। भाईजान, मुझे क़तई याद नहीं कि उस वक़्त मेरी दिमाग़ी हालत किस क़िस्म की थी।मेरा ख़्याल है कि मेरे होश-ओ-हवास पूरी तरह सलामत नहीं थे। गन्दे नाले में गिरते वक़्त तो मुझे कतई होश नहीं था। जब बाहर निकला तो जो हादिसा वक़ूअ पज़ीर हुआ था, उस के ख़द्द-ओ-ख़ाल आहिस्ता-आहिस्ता दिमाग़ में उभरने शुरू हुए।<br />दूर शोर की आवाज़ सुनाई दे रही थी, जैसे बहुत से लोग ग़ुस्से में चीख़-चिल्ला रहे हैं। मैं गंदा नाला उबूर करके ज़ाहिरा पीर के तकिए से होता हुआ हाल दरवाज़े के पास पहुँचा तो देखा कि तीस चालीस नौजवान जोश में भरे पत्थर उठा-उठा कर दरवाज़े के घड़ियाल पर मार रहे हैं। उस का शीशा टूट कर सड़क पर गिरा तो एक लड़के ने बाकियों से कहा &mdash; चलो.... मलिका का बुत तोड़ें!<br />दूसरे ने कहा &mdash; नहीं यार.... कोतवाली को आग लगाएँ!<br />तीसरे ने कहा &mdash; और सारे बैंकों को भी!<br />चौथे ने उन को रोका &mdash; ठहरो.... इस से क्या फ़ायदा... चलो पुल पर उन लोगों को मारें।<br />मैंने उस को पहचान लिया। ये थैला कंजर था.... नाम मोहम्मद तुफ़ैल था, मगर थैला कंजर के नाम से मशहूर था। इस लिए कि एक तवाइफ़ के बतन से था। बड़ा आवारागर्द था। छोटी उम्र ही में उस को जोय और शराबनोशी की लत पड़ गई थी। इस की दो बहनें शमशाद और अलमास अपने वक़्त की हसीन-तरीन तवाइफ़ें थीं। शमशाद का गला बहुत अच्छा था। उस का मुजरा सुनने के लिए रईस बड़ी-बड़ी दूर से आते थे। दोनोंअपने भाई के करतूतों से बहुत नालाँ थीं। शहर में मशहूर था कि उन्होंने एक क़िस्म का उस को आक़ कर रखा है। फिर भी वो किसी न किसी हीले अपनी ज़रूरीयात के लिए उन से कुछ न कुछ वसूल कर ही लेता था। वैसे वो बहुत ख़ुशपोश रहता था। अच्छा खाता था, अच्छा पीता था। बड़ा नफ़ासत-पसन्द था। हँसोड़पन और लतीफ़ागोई मिज़ाज में कूट-कूट के भरी थी। मीरासियों और भाण्डों के सोक़यानापन से बहुत दूर रहता था।लम्बा क़द, भरे-भरे हाथ-पाँव, मज़बूत कसरती बदन। नाक नक़्शे का भी ख़ासा था।<br />पुरजोश लड़कों ने उस की बात न सुनी और मलिका के बुत की तरफ़ चलने लगे। उस ने फिर उनसे कहा &mdash; मैंने कहा मत ज़ाए करो अपना जोश। इधर आओ मेरे साथ.... चलो उन को मारें, जिन्होंने हमारे बेक़सूर आदमियों की जान ली है और उन्हें ज़ख़्मी किया है..... ख़ुदा की क़सम, हम सब मिलकर उनकी गर्दन मरोड़ सकते हैं... चलो!<br />कुछ लड़के रवाना हो चुके थे। बाक़ी रुक गए। थैला पुल की तरफ़ बढ़ा तो वे सब उस के पीछे चलने लगे। मैंने सोचा कि माँओं के ये लाल बेकार मौत के मुँह में जा रहे हैं। मैं फव्वारे के पास दुबका खड़ा था। वहीं से मैंने थैले को आवाज़ दी और कहा &mdash; मत जाओ यार... क्यों अपनी और उनकी जान के पीछे पड़े हो।<br />थैले ने यह सुनकर एक अजीब-सा क़हक़हा बुलन्द किया और मुझ से कहा &mdash; थैला सिर्फ़ ये बताने चला है कि वो गोलियों से डरने वाला नहीं। फिर वो अपने साथियों से मुख़ातिब हुआ &mdash; तुम डरते हो तो वापस जा सकते हो।<br />ऐसे मौक़ों पर बढ़े हुए क़दम उल्टे कैसे हो सकते हैं। और फिर वो भी उस वक़्त जब लीडर अपनी जान हथेली पर रख कर आगे-आगे जा रहा हो।थैले ने क़दम तेज़ किए तो उसके साथियों को भी करने पड़े।<br />हाल दरवाज़े से पुल का फ़ासला कुछ ज़्यादा नहीं.... होगा कोई साठ-सत्तर गज़ के क़रीब.... थैला सब से आगे-आगे था। जहाँ से पुल का दोरौया मुतवाज़ी जंगला शुरू होता है, वहाँ से पन्द्रह- बीस क़दम के फ़ासले पर दो घुड़सवार गोरे खड़े थे। थैला नारे लगाता जब बंगले के आग़ाज़ के पास पहुँचा तो फ़ायर हुआ, मैं समझा कि वो गिर पड़ा है... लेकिन देखा कि वो उसी तरह.... ज़िन्दा आगे बढ़ रहा है। उसके बाक़ी साथी डर के भाग उठे हैं। मुड़कर उसने पीछे देखा और चिल्लाया &mdash; भागो नहीं.... आओ!<br />उस का मुँह मेरी तरफ़ था कि एक और फ़ायर हुआ। पलट कर उसने गोरों की तरफ़ देखा और पीठ पर हाथ फेरा... भाईजान, नज़र तो मुझे कुछ नहीं आना चाहिए था, मगर मैंने देखा कि उस की सफ़ेद बोसकी की क़मीज़ पर लाल-लाल धब्बे थे.... वो और तेज़ी से बढ़ा, जैसे ज़ख़्मी शेर... एक और फ़ायर हुआ। वो लड़खड़ाया मगर एकदम क़दम मज़बूत करके वो घुड़सवार गोरे पर लपका और एकाएक न जाने क्या हुआ.... घोड़े की पीठ ख़ाली थी। गोरा ज़मीन पर था और थैला उस के ऊपर.... दूसरे गोरे ने, जो क़रीब था और पहले बौखला गया था, बिदकते हुए घोड़े को रोका और धड़ाधड़ फ़ायर शुरू कर दिए.... इस के बाद जो कुछ हुआ मुझे मालूम नहीं। मैं वहाँ फव्वारे के पास बेहोश हो कर गिर पड़ा।<br />भाईजान, जब मुझे होश आया तो में अपने घर में था। चन्द पहचान केआदमी मुझे वहाँ से उठा लाए थे। उन की ज़बानी मालूम हुआ कि पुल पर से गोलियाँ खाकर हुजूम उग्र हो गया था। नतीजा इसका ये हुआ कि मलिका के बुत को तोड़ने की कोशिश की गई। टाउन हाल और तीन बैंकों को आग लगी और पाँच या छह यूरोपियन मारे गए। ख़ूब लूट मची।<br />लूट-खसोट का अँग्रेज़ अफ़सरों को इतना ख़याल नहीं था। पाँच या छःयूरोपियन हलाक हुए थे। इस का बदला लेने के लिए ही जलियाँवाला बाग़ का ख़ूनीं हादिसा हुआ। डिप्टी कमिशनर बहादुर ने शहर की बागडोर जनरल डावर के सपुर्द कर दी। चुनांचे जनरल साहिब ने बारह अप्रैल को फ़ौजियों के साथ शहर के मुख़्तलिफ़ बाज़ारों में मार्च किया और दर्जनों बेगुनाह आदमी गिरफ़्तार किए। तेरह को जलियाँवाला बाग़ में जलसा हुआ। क़रीब-क़रीब पच्चीस हज़ार का मजमा था। शाम के क़रीब जनरल डावर मुसल्लह गोरों और सिखों के साथ वहाँ पहुँचा और निहत्थे आदमियों पर गोलियों की बारिश शुरू कर दी।<br />उस वक़्त तो किसी को इसका ठीक-ठीक अन्दाज़ा नहीं था कि कितने आदमी मारे गए हैं। लेकिन बाद में जब जाँच हुई तो पता चला कि एक हज़ार हलाक हुए हैं और तीन या चार हज़ार के क़रीब ज़ख़्मी.... लेकिन मैं थैले की बात कर रहा था...। भाईजान, आँखों देखी आप को बता चुका हूँ... बे-ऐब ज़ात ख़ुदा की है। मरहूम में चारों ऐब शरई थे। एक पेशा तवाइफ़ के बतन से था मगर जियाला था.... मैं अब यक़ीन के साथ कह सकता हूँ कि इस मलऊन गोरे की पहली गोली भी उस को लगी थी। आवाज़ सुन कर उस ने जब पलटकर अपने साथियों की तरफ़ देखा था, और उन्हें हौसला दिलाया था, तब जोश की हालत में उस को मालूम नहीं हुआ था कि उसकी छाती में गर्म-गर्म सीसा उतर चुका है। दूसरी गोली उस की पीठ में लगी। तीसरी फिर सीने में.... मैंने देखा नहीं, पर सुना है जब थैले की लाश गोरे से जुदा की गई तो उसके दोनों हाथ उस की गर्दन में इस बुरी तरह से पैवस्त थे कि अलहदा ही नहीं होते थे.... गोरा तब जहन्नुम में जा चुका था...।<br />दूसरे रोज़, जब थैले की लाश कफ़न-दफ़न के लिए उस के घर वालों के सुपुर्द की गई तो उसका बदन गोलियों से छलनी हो रहा था.... दूसरे गोरे ने तो अपना पूरा पिस्तौल ही उस पर ख़ाली कर दिया था... मेरा ख़याल है, उस वक़्त मरहूम की रूह क़फ़स-ए-उंसुरी से परवाज़ कर चुकी थी। इस शैतान के बच्चे ने सिर्फ़ उस के मुर्दा जिस्म पर चाँदमारी की थी।<br />कहते हैं, जब थैले की लाश मुहल्ले में पहुँची तो कुहराम मच गया। अपनी बिरादरी में वो इतना मक़बूल नहीं था, लेकिन उस की क़ीमा-क़ीमा लाश देखकर सब धाड़ें मार-मार कर रोने लगे। उस की बहनें शमशाद और अलमास तो बेहोश हो गईं। जब जनाज़ा उठा तो इन दोनों ने ऐसे बीन किए कि सुनने वाले लहू के आँसू रोते रहे।<br />भाईजान, मैंने कहीं पढ़ा था कि फ़्राँस के इन्क़लाब में पहली गोली वहाँ की एक टखयाई को लगी थी। मरहूम मुहम्मद तुफ़ैल एक तवाइफ़ का लड़का था। इन्क़लाब की इस जद्द-ओ-जहद में उसको जो पहली गोली लगी थी, दसवीं थी या पचासवीं। इस के मुताल्लिक़ किसी ने भी तहक़ीक़ नहीं की। शायद इसलिए कि सोसाइटी में इस ग़रीब का कोई रुतबा नहीं था। मैं तो समझता हूँ कि पंजाब के इस ख़ूनीं ग़ुसल में नहाने वालों की फ़हरिस्त में थैले कंजर का नाम-ओ-निशान तक भी नहीं होगा... और ये भी कोई पता नहीं कि ऐसी कोई फ़हरिस्त तैयार भी हुई थी।<br />सख़्त हंगामी दिन थे। फ़ौजी हुकूमत का दौर-दौरा था। वो देव, जिसे मार्शल लॉ कहते हैं, शहर के गली-गली कूचे-कूचे में डकारता फिरता था। बहुत अफ़रा-तफ़री के आलम में उस ग़रीब को जल्दी-जल्दी यूँ दफ़न किया गया, जैसे उसकी मौत उसके सोगवार अज़ीज़ों का एक संगीन जुर्म थी जिसके निशानात वो मिटा देना चाहते थे।<br />बस भाईजान, थैला मर गया। थैला दफ़ना दिया गया और.... और ये कहकर मेरा हमसफ़र पहली मर्तबा कुछ कहते-कहते रुका और ख़ामोश हो गया। ट्रेन दनदनाती हुई जा रही थी। पटरियों की खटाखट ने ये कहना शुरू कर दिया। थैला मर गया... थैला दफ़ना दिया गया.... थैला मर गया.... थैला दफ़ना दिया गया। इस मरने और दफ़नाने के दरमयान कोई फ़ासला नहीं था, जैसे वो इधर मरा और उधर दफ़ना दिया गया। और खट-खट के साथ इन अलफ़ाज़ की हम-आहंगी कुछ इस क़दर जज़्बात से आरी थी कि मुझे अपने दिमाग़ से इन दोनों को जुदा करना पड़ा। चुनाँचे मैंने अपने हम-सफ़र से कहा &mdash; आप कुछ और भी सुनाने वाले थे?<br />चौंक कर उस ने मेरी तरफ़ देखा और बोला &mdash; जी हाँ.... इस दास्तान का एक अफ़सोसनाक हिस्सा बाक़ी है।<br />मैंने पूछा &mdash; वह क्या?<br />उस ने कहना शुरू किया &mdash; मैं आप से अर्ज़ कर चुका हूँ कि थैले की दो बहनें थीं। शमशाद और अलमास। बहुत ख़ूबसूरत थीं। शमशाद लम्बी थी।पतले-पतले नक़्श। ग़लाफ़ी आँखें। ठुमरी बहुत ख़ूब गाती थी। सुना है, ख़ाँ साहब, फ़तह अली ख़ां से तालीम लेती रही थी। दूसरी अलमास थी। उस के गले में सुर नहीं था, लेकिन नाचने में अपना सानी नहीं रखती थी। मुजरा करती थी तो ऐसा लगता था कि इस का अंग-अंग बोल रहा है। हर भाव में एक घात होती थी.... आँखों में वो जादू था जो हर एक के सर पर चढ़ के बोलता था।<br />मेरे हमसफ़र ने तारीफ़-ओ-तौसीफ में कुछ ज़रूरत से ज़्यादा वक़्त लिया। मगर मैंने टोकना मुनासिब न समझा। थोड़ी देर के बाद वो ख़ुद इस लम्बे चक्कर से निकला और दास्तान के अफ़सोनाक हिस्से की तरफ़ आया &mdash; क़िस्सा यह है, भाईजान, कि इन आफ़त की परकाला दो बहनों के हुस्न-ओ-जमाल का ज़िक्र किसी ख़ुशामदी ने फ़ौजी अफ़सरों से कर दिया.... बल्वे में एक मेम.... क्या नाम था उस चुड़ैल का?मिस....मिस शेरवुड मारी गई थी.... तय ये हुआ कि उन को बुलवाया जाए और.... और.... जी भर के इंन्तकाम लिया जाए.... आप समझ गए ना, भाई जान?<br />मैंने कहा &mdash; जी हाँ!<br />मेरे हमसफ़र ने एक आह भरी &mdash; ऐसे नाज़ुक मामलों में तवाइफ़ें और कस्बियाँ भी अपनी माँएँ-बहनें होती हैं.... मगर भाईजान ये मुल्क अपनी इज़्ज़त-ओ-नामूस को, मेरा ख़्याल है, पहचानता ही नहीं। जब ऊपर से इलाक़े के थानेदार को आर्डर मिला तो वो फ़ौरन तैयार हो गया। चुनांचे वो ख़ुद शमशाद और अलमास के मकान पर गया और कहा कि साहब लोगों ने याद किया है। वो तुम्हारा मुजरा सुनना चाहते हैं... भाई की क़ब्र की मिट्टी भी अभी तक ख़ुशक नहीं हुई थी। अल्लाह को प्यारा हुए उस ग़रीब को सिर्फ़ दो दिन हुए थे कि ये हाज़िरी का हुक्म सादिर हुआ कि आओ हमारे हुज़ूर नाचो.... अज़िय्यत का इससे बढ़ कर पुर-अज़िय्यत तरीक़ा क्या हो सकता है....? मुस्तबइद तम्सख़ुर की ऐसी मिसाल, मेरा ख़्याल है, शायद ही कोई और मिल सके.... क्या हुक्म देने वालों को इतना ख़याल भी न आया कि तवाइफ़ भी ग़ैरतमन्द होती है? ....हो सकती है... क्यों नहीं हो सकती? उस ने अपने आप से सवाल किया, लेकिन मुख़ातिब वो मुझसे ही था।<br />मैंने कहा &mdash; हाँ, हो सकती है!<br />&mdash; जी हाँ ....थैला आख़िर इन का भाई था। उस ने किसी की मार ख़ाने की लड़ाई-भिड़ाई में अपनी जान नहीं दी थी। वो शराब पी कर दंगा-फ़साद करते हुए हलाक नहीं हुआ था। उसने वतन की राह में बड़े बहादुराना तरीक़े पर शहादत का जाम पिया था। वो एक तवाइफ़ के बतन से था। लेकिन वो तवाइफ़ माँ थी और शमशाद और अलमास उसी की बेटियां थीं और ये थैले की बहनें थीं.... तवाइफ़ें बाद में थीं.... और वो थैले की लाश देख कर बेहोश हो गई थीं। जब उस का जनाज़ा उठा था तो उन्होंने ऐसे बीन किए थे कि सुन कर आदमी लहू रोता था....।<br />मैंने पूछा &mdash; वो गईं?<br />मेरे हमसफ़र ने इस का जवाब थोड़े वक़फ़े के बाद उदासी से दिया &mdash; जी हाँ... जी हाँ गईं... ख़ूब सज बनकर। एक दम उसकी उदासी गहरी हो गई &mdash; सोलह सिंगार करके अपने बुलाने वालों के पास गईं.... कहते हैं कि ख़ूब महफ़िल जमी.... दोनों बहनों ने अपने जौहर दिखाए.... ज़रक़-बरक़ पिशवाज़ों में मलबूस वो कोह-ए-क़ाफ़ की परियाँ मालूम होती थीं....शराब के दौर चलते रहे और वो नाचती-गाती रहीं... ये दोनों दौर चलते रहे .... और कहते हैं कि.... रात के दो बजे एक बड़े अफ़सर के इशारे पर महफ़िल बरख़ास्त हुई...।<br />मेरा हमसफ़र उठ खड़ा हुआ और बाहर भागते हुए दरख़्तों को देखने लगा।पहियों और पटरियों की आहनी गड़गड़ाहट की ताल पर उसके आख़िरी दो लफ़्ज़ नाचने लगे &mdash; बरख़ास्त हुई... बरख़ास्त हुई।<br />मैंने अपने दिमाग़ में उन्हें, आहनी गड़गड़ाहट से नोच कर अलहदा करते हुए उससे पूछा &mdash; फिर क्या हुआ?<br />भागते हुए दरख़्तों और खम्भों से नज़रें हटा कर उस ने बड़े मज़बूत लहजे में कहा &mdash; उन्होंने अपनी ज़रक़-बरक़ पिशवाज़ें नोच डालें और अलिफ़ नंगी हो गईं और कहने लगीं.... लो देख लो... हम थैले की बहनें हैं.... उस शहीद की, जिसके ख़ूबसूरत जिस्म को तुमने सिर्फ़ इसलिए अपनी गोलियों से छलनी-छलनी किया था कि उसमें वतन से मोहब्बत करने वाली रूह थी... हम उसी की ख़ूबसूरत बहनें हैं... आओ, अपनी शहवत के गर्म-गर्म लोहे से हमारा ख़ुशबूओं में बसा हुआ जिस्म दागदार करो.... मगर ऐसा करने से पहले सिर्फ़ हमें एक बार अपने मुँह पर थूक लेने दो...।<br />यह कहकर वो ख़ामोश हो गया। कुछ इस तरह कि और नहीं बोलेगा। मैंने फ़ौरन ही पूछा &mdash; फिर क्या हुआ?<br />उस की आँखों में आँसू डबडबा आए &mdash; उनको.... उनको गोली से उड़ा दिया गया।<br />मैंने कुछ न कहा। गाड़ी आहिस्ता होकर स्टेशन पर रुकी तो उस ने क़ुली बुलाकर अपना अस्बाब उठवाया। जब जाने लगा तो मैं ने उस से कहा &mdash; आपने जो दास्तान सुनाई, इस का अंजाम मुझे आप का ख़ुदसाख़्ता मालूम होता है।<br />एकदम चौंककर उसने मेरी तरफ़ देखा &mdash; ये आप ने कैसे जाना?<br />मैंने कहा &mdash; आप के लहजे में एक नाक़ाबिल-ए-बयान कर्ब था।<br />मेरे हमसफ़र ने अपने हलक़ की तल्ख़ी थूक के साथ निगलते हुए कहा &mdash; जी हाँ... उन हराम..., वो गाली देते-देते रुक गया &mdash; उन्होंने अपने शहीद भाई के नाम पर बट्टा लगा दिया।<br />यह कहकर वो प्लेटफार्म पर उतर गया।<br />(11-12 अक्तूबर1951 ईस्वी)</p>

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  5. अंजाम-ए-नजीर

    बटवारे के बाद जब फ़िर्का-वाराना फ़सादात शिद्दत इख़्तियार कर गए और जगह जगह हिंदूओं और मुस्लमानों के ख़ून से ज़मीन रंगी जाने लगी तो नसीम अख़तर जो दिल्ली की नौ-ख़ेज़ तवाइफ़ थी अपनी बूढ़ी माँ से कहा चलो माँ यहां से चलेंबूढ़ी बाइका ने अपने पोपले मुँह में पानदान से छालिया के बारीक बारीक टुकड़े डालते हुए उस से पूछा कहाँ जाऐंगे बेटा

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