अल्लाह दित्ता

Saadat Hasan MantoSaadat Hasan Manto11 May 1912

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दो भाई थे। अल्लाह रक्खा और अल्लाह दित्ता। दोनों रियासत पटियाला के बाशिंदे थे। उन के आबा-ओ-अजदाद अलबत्ता लाहौर के थे मगर जब इन दो भाईयों का दादा मुलाज़मत की तलाश में पटियाला आया तो वहीं का हो रहा।

अल्लाह रक्खा और अल्लाह दित्ता दोनों सरकारी मुलाज़िम थे। एक चीफ़ सेक्रेटरी साहब बहादुर का अर्दली था, दूसरा कंट्रोलर आफ़ स्टोरेज़ के दफ़्तर का चपड़ासी।

दोनों भाई एक साथ रहते थे ताकि ख़र्च कम हो। बड़ी अच्छी गुज़र रही थी। एक सिर्फ़ अल्लाह रक्खा को जो बड़ा था, अपने छोटे भाई के चाल चलन के मुतअल्लिक़ शिकायत थी। वो शराब पीता था। रिश्वत लेता था और कभी कभी किसी ग़रीब और नादार औरत को फांस भी लिया करता था। मगर अल्लाह रक्खा ने हमेशा चश्म-पोशी से काम लिया था कि घर का अम्न-ओ-सुकून दरहम बरहम न हो।

दोनों शादीशुदा थे। अल्लाह रक्खा की दो लड़कियां थीं। एक ब्याही जा चुकी थी और अपने घर में ख़ुश थी। दूसरी जिस का नाम सुग़रा था, तेराह बरस की थी और प्राइमरी स्कूल में पढ़ती थी।

अल्लाह दित्ता की एक लड़की थी......ज़ैनब...... उस की शादी हो चुकी थी मगर अपने घर में इतनी ख़ुश नहीं थी। इस लिए कि उस का ख़ाविंद ओबाश था। फिर भी वो जूं तूं निभाए जा रही थी। ज़ेनब अपने भाई तुफ़ैल से तीन साल बड़ी थी। इस हिसाब से तुफ़ैल की उम्र अठारह उन्नीस बरस के क़रीब होती थी। वो लोहे के एक छोटे से कारख़ाने में काम सीख रहा था। लड़का ज़हीन था, चुनांचे काम सीखने के दौरान में भी पंद्रह रुपय माहवार उसे मिल जाते थे।

दोनों भाईयों की बीवियां बड़ी इताअत-शिआर, मेहनती और इबादत-गुज़ार औरतें थीं। उन्हों ने अपने शौहरों को कभी शिकायत का मौक़ा नहीं दिया था।

ज़िंदगी बड़ी हम-वार गुज़र रही थी कि इका-ईकी हिंदू मुस्लिम फ़सादाद शुरू हो गए। दोनों भाईयों के वहम-ओ-गुमान में भी नहीं था कि उन के माल-ओ-जान और इज़्ज़त-ओ-आबरू पर हमला होगा और उन्हें अफ़रा-तफ़री और कस्म-पुर्सी के आलम में रियासत पटियाला छोड़ना पड़ेगी...... मगर ऐसा हुआ।

दोनों भाईयों को क़तअन मालूम नहीं कि इस ख़ूनीं तूफ़ान में कौन सा दरख़्त गिरा, कौन से दरख़्त से कौन सी टहनी टूटी...... जब होश-ओ-हवास किसी क़दर दुरुस्त हुए तो चंद हक़ीक़तें सामने आएं और वो लरज़ गए।

अल्लाह रक्खा की लड़की का शौहर शहीद कर दिया गया था और उस की बीवी को बुलवाइयों ने बड़ी बे-दर्दी से हलाक कर दिया था।

अल्लाह दित्ता की बीवी को भी सिखों ने किरपाणों से काट डाला था। उसकी लड़की ज़ैनब...... का बद-चलन शौहर भी मौत के घाट उतार दिया गया था।

रोना धोना बे-कार था। सब्र शुक्र के बैठ रहे...... पहले तो कैम्पों में गलते सड़ते रहे। फिर गली कूचों में भीक मांगा किए। आख़िर ख़ुदा ने सुनी। अल्लाह दित्ता को गुजरांवाला में एक छोटा सा शिकस्ता मकान सर छुपाने को मिल गया। तुफ़ैल ने दौड़ धूप की तो उसे काम मिल गया।

अल्लाह रक्खा लाहौर ही में देर तक दर-ब-दर फिरता रहा। जवान लड़की साथ थी। गोया एक पहाड़ का पहाड़ उस के सर पर था। ये अल्लाह ही जानता है कि उस ग़रीब ने किस तरह डेढ़ बरस गुज़ारा। बीवी और बड़ी लड़की का ग़म वो बिलकुल भूल चुका था। क़रीब था कि वो कोई ख़तरनाक क़दम उठाए कि उसे रियासत पटियाला के एक बड़े अफ़्सर मिल गए जो उस के बड़े मेहरबान थे। उस ने उन को अपनी हालत-ए-ज़ार अलिफ़ से ले कर यए तक कह सुनाई। आदमी रहम दिल था। उस को बड़ी दिक्कतों के बाद लाहौर के एक आरिज़ी दफ़्तर में अच्छी मुलाज़मत मिल गई थी, चुनांचे उन्हों ने दूसरे रोज़ ही उस को चालीस रुपया माहवार पर मुलाज़िम रख लिया और एक छोटा सा क्वार्टर भी रिहाइश के लिए दिलवा दिया।

अल्लाह रक्खा ने ख़ुदा का शुक्र अदा किया जिस ने उस की मुश्किलात दूर कीं। अब वो आराम से सांस ले सकता था और मुस्तक़बिल के मुतअल्लिक़ इत्मिनान से सोच सकता था। सुग़रा बड़े सलीक़े वाली सुघड़ लड़की थी, सारा दिन घर के काम काज में मसरूफ़ रहती। इधर उधर से लकड़ियां चुन के लाती। चूल्हा सुलगाती और मिट्टी की हंडिया में हर रोज़ इतना सालन पकाती जो दो वक़्त के लिए पूरा हो जाये। आटा गूँधती। पास ही तनूर था, वहां जा कर रोटियां लगवा लेती।

तन्हाई में आदमी क्या कुछ नहीं सोचता। तरह तरह के ख़यालात आते हैं। सुग़रा आम तौर पर दिन में तन्हा होती थी और अपनी बहन और माँ को याद कर के आँसू बहाती रहती थी, पर जब बाप आता तो वो अपनी आँखों में सारे आँशू ख़ुश्क कर लेती थी ताकि उस के ज़ख़्म हरे न हूँ। लेकिन वो इतना जानती थी कि उस का बाप अंदर ही अंदर घुला जा रहा है। उस का दिल हर-वक़्त रोता रहता है मगर वो किसी से कहता नहीं। सुग़रा से भी उस ने कभी उस की माँ और बहन का ज़िक्र नहीं किया था।

ज़िंदगी उफ़्तां-ओ-ख़ीज़ां गुज़र रही थी। उधर गुजरांवाला में अल्लाह दित्ता अपने भाई के मुक़ाबले में किसी क़दर ख़ुश हाल था, क्यों कि उसे भी मुलाज़मत मिल गई थी और ज़ैनब भी थोड़ा बहुत सिलाई का काम कर लेती थी। मिल मिला के कोई एक सौ रुपय माहवार हो जाते थे जो तीनों के लिए बहुत काफ़ी थे।

मकान छोटा था, मगर ठीक था। ऊपर की मंज़िल में तुफ़ैल रहता था, निचली मंज़िल में ज़ैनब और उस का बाप। दोनों एक दूसरे का बहुत ख़याल रखते थे। अल्लाह दित्ता उसे ज़्यादा काम नहीं करने देता था। चुनांचे मुँह अंधेर उठ कर वह सहन में झाड़ू दे कर चूल्हा सुलगा देता था कि ज़ेनब का काम कुछ हल्का हो जाये। वक़्त मिलता तो दो तीन घड़े भर कर घड़ौंची पर रख देता था।

ज़ेनब ने अपने शहीद ख़ाविंद को कभी याद नहीं किया था। ऐसा मालूम होता था जैसे वो उस की ज़िंदगी में कभी था ही नहीं। वो ख़ुश थी। अपने बाप के साथ बहुत ख़ुश थी। बाज़ औक़ात वो उस से लिपट जाती थी......तुफ़ैल के सामने भी। और उस को ख़ूब चूमती थी।

सुग़रा अपने बाप से ऐसे चहल नहीं करती थी...... अगर मुम्किन होता तो वो उस से पर्दा करती। इस लिए नहीं कि वो कोई ना-महरिम था। नहीं...... सिर्फ़ एहतिराम के लिए...... उस के दिल से कई दफ़ा ये दुआ उठती थी। “या परवरदिगार...... मेरा बाप मेरा जनाज़ा उठाए।”

बाज़ औक़ात कई दुआएं उल्टी साबित होती हैं। जो ख़ुदा को मंज़ूर था, वही होना था। ग़रीब सुग़रा के सर पर ग़म-ओ-अंदोह का एक और पहाड़ टूटना था।

जून के महीने दोपहर को दफ़्तर के किसी काम पर जाते हुए तप्ती हुई सड़क पर अल्लाह रक्खा को ऐसी लू लगी कि बे-होश हो कर गिर पड़ा। लोगों ने उठाया। हस्पताल पहुंचाया मगर दवा दारू ने कोई काम न किया।

सुग़रा बाप की मौत के सदमे से नीम पागल हो गई। उस ने क़रीब क़रीब आधे बाल नोच डाले। हम-साइयों ने बहुत दम-दिलासा दिया मगर ये कारगर कैसे होता...... वो तो ऐसी कश्ती के मानिंद थी जो उस का बादबान हो न कोई पतवार और बीज मंजधार के आन फंसी हुई।

पटियाला के वो अफ़्सर जिन्हों ने मरहूम अल्लाह रक्खा को मुलाज़मत दिलवाई थी, फ़रिश्ता रहमत साबत हुए। उन को जब इत्तिला मिली तो दौड़े आए। सब से पहले उन्हों ने ये काम किया कि सुग़रा को मोटर में बिठा कर घर छोड़ आए और बीवी से कहा कि वो इस का ख़्याल रखे। फिर हस्पताल में जा कर उन्हों ने अल्लाह रक्खा के ग़ुसल वग़ैरा का वहीं इंतिज़ाम किया और दफ़्तर वालों से कहा कि वो उस को दफ़ना आएं।

अल्लाह दित्ता को अपने भाई के इंतिक़ाल की ख़बर बड़ी देर के बाद मिली। बहर-हाल, वो लाहौर आया और पूछता पाछता वहां पहुंच गया जहां सुग़रा थी। उस ने अपनी भतीजी को बहुत दम दिलासा दिया, बहलाया। सीने के साथ लगाया, प्यार किया। दुनिया की बे-सबाती का ज़िक्र किया। बहादुर बनने को कहा, मगर सुग़रा के फटे हुए दिल पर इन तमाम बातों का क्या असर होता। ग़रीब ख़ामोश अपने आँसू दोपट्टे में ख़ुश्क करती रही।

अल्लाह दित्ता ने अफ़्सर साहब से आख़िर में कहा। “मैं आप का बहुत शुक्र गुज़ार हूँ। मेरी गर्दन आप के एहसानों तले हमेशा दबी रहेगी। मरहूम की तजहीज़-ओ-तकफ़ीन का आप ने बंद-ओ-बस्त किया। फिर ये बच्ची जो बिलकुल बे-आसरा रह गई थी, इस को आप ने अपने घर में जगह दी...... ख़ुदा आप को इस का अज्र दे...... अब में उसे अपने साथ लिए जाता हूँ। मेरे भाई की बड़ी क़ीमती निशानी है।”

अफ़्सर साहब ने कहा। “ठीक है...... लेकिन तुम अभी इसे कुछ देर और यहां रहने दो...... तबीयत सँभल जाये तो ले जाना।”

अल्लाह दित्ता ने कहा। “हुज़ूर! मैं ने इरादा किया है कि इस की शादी अपने लड़के से करूंगा और बहुत जल्द!”

अफ़्सर साहब बहुत ख़ुश हुए। “बड़ा नेक इरादा है...... लेकिन इस सूरत में जब कि तुम उस की शादी अपने लड़के से करने वाले हो, इस का इस घर में रहना मुनासिब नहीं। तुम शादी का बंद-ओ-बस्त करो। मुझे तारीख़ से मतला कर देना। ख़ुदा के फ़ज़ल-ओ-करम से सब ठीक हो जाएगा।”

बात दुरुस्त थी। अल्लाह दित्ता वापस गुजरांवाला चला गया। ज़ैनब उस की ग़ैर-मौजूदगी में बड़ी उदास हो गई थी। जब वो घर में दाख़िल हुआ तो वो उस से लिपट गई और कहने लगी कि उस ने इतनी देर क्यों लगाई?

अल्लाह दित्ता ने प्यार से उसे एक तरफ़ हटाया। “अरे बाबा, आना जाना किया है...... क़ब्र पर फ़ातिहा पढ़नी थी। सुग़रा से मिलना था, उसे यहां लाना था।”

ज़ैनब न मालूम क्या सोचने लगी। “सुग़रा को यहां लाना था।” एक दम चौंक कर। “हाँ......सुग़रा को यहां लाना था। पर वो कहाँ है?”

“वहीं है...... पटियाले के एक बड़े नेक दिल अफ़्सर हैं, उन के पास है। उन्हों ने कहा जब तुम इस की शादी का बंद-ओ-बस्त कर लोगे तो ले जाना” ये कहते हुए इस ने बीड़ी सुलगाई।

ज़ैनब ने बड़ी दिलचस्पी लेते हुए पूछा। “उस की शादी का बंद-ओ-बस्त कर रहे हो...... कोई लड़का है तुम्हारी नज़र में?”

अल्लाह दित्ता ने ज़ोर का कश लगाया। “अरे भई, अपना तुफ़ैल...... मेरे बड़े भाई की सिर्फ़ एक ही निशानी तो है...... मैं उसे किया ग़ैरों के हवाले कर दूँगा?”

ज़ैनब ने ठंडी सांस भरी। “तो सुग़रा की शादी तुम तुफ़ैल से करोगे?”

अल्लाह दित्ता ने जवाब दिया। “हाँ...... क्या तुम्हें कोई एतराज़ है?”

ज़ैनब ने बड़े मज़बूत लहजे में कहा। “हाँ...... और तुम जानते हो, क्यों है...... ये शादी हर्गिज़ नहीं होगी!”

अल्लाह दित्ता मुस्कुराया। ज़ैनब की ठोढ़ी पकड़ कर इस ने उस का मुँह चूमा। “पगली...... हर बात पर शक करती है...... और बातों को छोड़, आख़िर में तुम्हारा बाप हूँ।”

ज़ैनब ने बड़े ज़ोर से हून्ह की। “बाप!” और अंदर कमरे में जा कर रोने लगी।

अल्लाह दित्ता उस के पीछे गया और उस को पुचकारने लगा।

दिन गुज़रते गए। तुफ़ैल फ़रमां-बर्दार लड़का था। जब उस के बाप ने सुग़रा की बात तो वो फ़ौरन मान गया। आख़िर तीन चार महीने के बाद तारीख़ मुक़र्रर हो गई...... अफ़्सर साहब ने फ़ौरन सुग़रा के लिए एक बहुत अच्छा जोड़ा सिलवाया जो उसे शादी के दिन पहनना था। एक अँगूठी भी ले दी। फिर उस ने मोहल्ले वालों से अपील की कि वो एक यतीम लड़की की शादी के लिए जो बिलकुल बे-सहारा है, हस्ब-ए-तौफ़ीक़ कुछ दें।

सुग़रा को क़रीब क़रीब सभी जानते थे और उस के हालात से वाक़िफ़ थे, चुनांचे उन्हों ने मिल मिला कर उस के लिए बड़ा अच्छा जहेज़ तैय्यार कर दिया।

सुग़रा दुल्हन बनी तो उसे ऐसा महसूस हुआ कि तमाम दुख जमा हो गए हैं और उस को पीस रहे हैं। बहरहाल, वो अपने ससुराल पहुंची जहां उस का इस्तिक़बाल ज़ैनब ने क्या, कुछ इस तरह कि सुग़रा को उसी वक़्त मालूम हो गया कि वो उस के साथ बहनों का सा सुलूक नहीं करेगी बल्कि सास की तरह पेश आएगी।

सुग़रा का अंदेशा दुरुस्त था। इस के हाथों की मेहंदी अभी अच्छी तरह उतरने भी न पाई थी कि ज़ैनब ने उस से नौकरों के काम लेने शुरू कर दिए। झाड़ू वो देती। बर्तन वो मांझती। चूल्हा वो झोंकती। पानी वो भर्ती। ये सब काम वो बड़ी फुर्ती और बड़े सलीक़े से करती, लेकिन फिर भी ज़ैनब ख़ुश ना होती। बात बात पर उस को डाँटती डपटती, झिड़कती रही।

सुग़रा ने दिल में तहय्या कर लिया था, वो ये सब कुछ बर्दाश्त करेगी और कभी हर्फ़-ए-शिकायत ज़बान पर न लाएगी, क्यों कि अगर उसे यहां से धक्का मिल गया तो उस के लिए और कोई ठिकाना नहीं था।

अल्लाह दित्ता का सुलूक अलबत्ता इस से बुरा नहीं था। ज़ैनब की नज़र बचा कर कभी कभार वो उस को प्यार कर लेता था और कहता था कि वो कुछ फ़िक्र न करे। सब ठीक हो जाएगा।

सुग़रा को इस से बहुत ढारस होती। ज़ैनब जब कभी अपनी किसी सहेली के हाँ जाती और अल्लाह दित्ता इत्तिफ़ाक़ से घर पर होता तो वो उस से दिल खोल कर प्यार करता। उस से बड़ी मीठी मीठी बातें करता। काम में उस का हाथ बटाता। इस के वास्ते उस ने जो चीज़ें छुपा कर रखी होती थीं, देता और सीने के साथ लगा कर उस से कहती। “सुग़रा, तुम बड़ी प्यारी हो!”

सुग़रा झेंप जाती। दर-अस्ल वो इतने पुर-जोश प्यार की आदी नहीं थी। उस का मरहूम बाप अगर कभी उसे प्यार करना चाहता था तो सिर्फ़ उस के सर पर हाथ फेर दिया करता था या इस के कंधे पर हाथ रख कर ये दुआ दिया करता था। “ख़ुदा मेरी बेटी के नसीब अच्छे करे।”

सुग़रा तुफ़ैल से बहुत ख़ुश थी। वो बड़ा अच्छा ख़ाविंद था। जो कमाता था, उस के हवाले कर देता था, मगर सुग़रा ज़ैनब को दे देती थी, इस लिए कि वो उस के क़हर-ओ-ग़ज़ब से डरती थी।

तुफ़ैल से सुग़रा ने ज़ेनब की बद-सुलूकी और उस के सास ऐसे बरताओ का कभी ज़िक्र नहीं किया था। वो सुलह-ए-कुल थी। वो नहीं चाहती थी कि इस के बाइस घर में किसी क़िस्म की बद-मज़्गी पैदा हो। और भी कई बातें थीं जो वो तुफ़ैल से कहना चाहती तो कह देती मगर उसे डर था कि तूफ़ान बरपा हो जाएगा। और तो इस में से बच कर निकल जाऐंगे मगर वो अकेली इस में फंस जाएगी , और उस की ताब ना ला सकेगी।

ये ख़ास बातें उसे चंद रोज़ हुए मालूम हुई थीं और वो काँप काँप गई थी। अब अल्लाह दित्ता उसे प्यार करना चाहता तो वो अलग हट जाती, या दोड़ कर ऊपर चली जाती, जहां वो और तुफ़ैल रहते थे।

तुफ़ैल को जुमा की छुट्टी होती थी। अल्लाह दित्ता को इतवार की। अगर ज़ैनब घर पर होती तो वो जल्दी जल्दी काम काज ख़त्म कर के ऊपर चली जाती। अगर इत्तिफ़ाक़ से इतवार को ज़ैनब कहीं बाहर गई होती तो सुग़रा की जान पर बनी रहती। डर के मारे उस से काम न होता, लेकिन ज़ैनब का ख़याल आता तो उसे मजबूरन काँपते हाथों से धड़कते दिल से तौअन-व-करहन सब कुछ करना पड़ता। अगर वो खाना वक़्त पर न पकाए तो उस का ख़ाविंद भूका रहे क्यों कि वो ठीक बारह बजे अपना शागिर्द रोटी के लिए भेज देता था।

एक दिन इतवार को जब कि ज़ैनब घर पर नहीं थी, और वो आटा गूँध रही थी, अल्लाह दित्ता पीछे से दबे पांव आया और खलनडरे अंदाज़ में उस की आँखों पर हाथ रख दिए। वो तड़प कर उठी, मगर अल्लाह दित्ता ने उसे अपनी मज़बूत गिरिफ़्त में ले लिया।

सुग़रा ने चीख़ना शुरू कर दिया मगर वहां सुनने वाला कौन था। अल्लाह दित्ता ने कहा। “शोर मत मचाओ। ये सब बे-फ़ाइदा है...... चलो आओ!”

वो चाहता था कि सुग़रा को उठा कर अंदर ले जाये। कमज़ोर थी मगर ख़ुदा जाने उस में कहाँ से इतनी ताक़त आ गई कि अल्लाह दित्ता की गिरिफ़्त से निकल गई और हांपती काँपती ऊपर पहुंच गई। कमरे में दाख़िल हो कर उस ने अंदर से कुंडी चढ़ा दी।

थोड़ी देर के बाद ज़ैनब आ गई। अल्लाह दित्ता की तबीयत ख़राब हो गई थी। अंदर कमरे में लेट कर उस ने ज़ैनब को पुकारा। वो आई तो उस से कहा। “इधर आओ, मेरी टांगें दबाओ...... ज़ैनब उचक कर पलंग पर बैठ गई और अपने बाप की टांगें दबाने लगी...... थोड़ी देर के बाद दोनों के सांस तेज़ तेज़ चलने लगे।

ज़ैनब ने अल्लाह दित्ता से पूछा। “क्या बात है? आज तुम अपने आप में नहीं हो”

अल्लाह दित्ता ने सोचा कि ज़ैनब से छुपाना फ़ुज़ूल है, चुनांचे उस ने सारा माजरा बयान कर दिया। ज़ैनब आग बगूला हो गई। “क्या एक काफ़ी नहीं थी...... तुम्हें तो श्रम न आई, पर अब तो आनी चाहिए थी...... मुझे मालूम था कि ऐसा होगा, इसी लिए मैं शादी के ख़िलाफ़ थी...... अब सुन लो कि सुग़रा इस घर में नहीं रहेगी!”

अल्लाह दित्ता ने बड़े मिस्कीन लहजे में पूछा। “क्यों?”

ज़ैनब ने खुले तौर पर कहा। “मैं इस घर में अपनी सौतन देखना नहीं चाहती!”

अल्लाह दित्ता का हलक़ ख़ुश्क हो गया। इस के मुँह से कोई बात न निकल सकी।

ज़ैनब बाहर निकली तो उस ने देखा कि सुग़रा सहन में झाड़ू दे रही है। चाहती थी कि इस से कुछ कहे मगर ख़ामोश रही।

इस वाक़े को दो महीने गुज़र गए...... सुग़रा ने महसूस किया कि तुफ़ैल उस से खिचा खिचा रहता था। ज़रा ज़रा सी बात पर उस को शक की निगाहों से देखता था। आख़िर एक दिन आया कि उस ने तलाक़ नामा उस के हाथ में दिया और घर से बाहर निकाल दिया।

(1954)

Saadat Hasan Manto
About the poet

Saadat Hasan Manto

Saadat Hasan Manto (/mɑːn, -tɒ/; Urdu: سعادت حسن منٹو‎, pronounced [səˈaːd̪ət̪ ˈɦəsən ˈməɳʈoː]; 11 May 1912 – 18 January 1955) was a Pakistani writer, playwright and author born in Ludhiana, British India. Writing mainly in the Urdu language, he produced 22 c…

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  2. 1919 की एक बात

    <br />ये 1919 ईस्वी की बात है, भाईजान, जब रौलेट ऐक्ट के ख़िलाफ़ सारे पंजाब में एजीटेशन हो रहा था। मैं अमृतसर की बात कर रहा हूँ। सर माईकल ओडवायर ने डिफ़ेन्स ऑफ़ इण्डिया रूल्ज़ के मातहत गांधी जी का दाख़िला पंजाब में बन्द कर दिया था। वो इधर आ रहे थे कि पलवाल के मुक़ाम पर उनको रोक लिया गया और गिरफ़्तार करके वापस बम्बई भेज दिया गया। जहाँ तक में समझता हूँ, भाईजान, अगर अँग्रेज़ ये ग़लती न करता तो जलियाँवाला बाग़ का हादसा उस की हुक्मरानी की स्याह तारीख़ में ऐसे ख़ूनीं वर्क़ का इज़ाफ़ा कभी न करता।<br />क्या मुसलमान, क्या हिन्दू, क्या सिख, सब के दिल में गांधी जी की बेहद इज़्ज़त थी। सब उन्हें महात्मा मानते थे। जब उन की गिरफ़्तारी की ख़बर लाहौर पहुँची तो सारा कारोबार एकदम बन्द हो गया। यहाँ से अमृतसर वालों को मालूम हुआ, चुनाँचे यूँ चुटकियों में मुकम्मल हड़ताल हो गई।<br />कहते हैं कि नौ अप्रैल की शाम को डाक्टर सत्यपाल और डाक्टर किचलू की ज़िलावतनी के आर्डर डिप्टी कमिशनर को मिल गए थे। वो उन की तामील के लिए तैयार नहीं था क्योंकि उसके ख़्याल के मुताबिक़ अमृतसर में किसी हैजान-ख़ेज बात का ख़तरा नहीं था। लोग पुरअम्न तरीक़े से एहितजाजी जलसे वग़ैरा करते थे। जिनसे तशद्दुद का सवाल ही पैदा नहीं होता था। मैं अपनी आँखों देखा हाल बयान करता हूँ। नौ को रामनवमी थी।। जलूस निकला मगर मजाल है जो किसी ने हुक्काम की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ एक क़दम उठाया हो, लेकिन भाईजान, सर माईकल अजब औंधी खोपड़ी का इनसान था। उस ने डिप्टी कमिशनर की एक ना सुनी। उस पर, बस, यही ख़ौफ़ सवार था कि ये लीडर महात्मा गांधी के इशारे पर सामराज का तख़्ता उलटने के दर पे हैं और जो हड़तालें हो रही हैं और जलसे मुनअक़िद होते हैं उनके पस-ए-पर्दा यही साज़िश काम कर रही है।<br />डाक्टर किचलू और डाक्टर सत्यपाल की ज़िलावतनी की ख़बर आनन-फ़ानन शहर में आग की तरह फैल गई। दिल हर शख़्स का मुकद्दर था। हर वक़्त धड़का-सा लगा रहता था कि कोई बहुत बड़ा हादिसा बरपा होने वाला है, लेकिन, भाईजान, जोश बहुत ज़्यादा था। कारोबार बन्द थे। शहर क़ब्रिस्तान बना हुआ था, पर इस क़ब्रिस्तान की ख़ामोशी में भी एक शोर था। जब डाक्टर किचलू और सत्यपाल की गिरफ़्तारी की ख़बर आई तो लोग हज़ारों की तादाद में इकट्ठे हुए कि मिलकर डिप्टी कमिशनर बहादुर के पास जाएँ और अपने महबूब लीडरों की जिलावतनी के अहकाम मंसूख़ कराने की दरख़ास्त करें। मगर वो ज़माना, भाईजान, दरख़ास्तें सुनने का नहीं था। सर माईकल जैसा फ़िरऔन हाकिम-ए-आला था। उसने दरख़ास्त सुनना तो कुजा लोगों के इस इजतिमा ही को ग़ैरक़ानूनी क़रार दिया।<br />अमृतसर.......वो अमृतसर जो कभी आज़ादी की तहरीक का सब से बड़ा मर्कज़ था, जिस के सीने पर जलियाँवाला बाग़ जैसा क़ाबिल-ए-फ़ख़्रज़ख़्म था, आज किस हालत में है?.......लेकिन छोड़िए इस क़िस्से को। दिल को बहुत दुख होता है। लोग कहते हैं कि इस मुक़द्दस शहर में जो कुछ आज से पाँच बरस पहले हुआ उस के ज़िम्मेदार भी अँग्रेज़ हैं। होगा भाईजान, पर सच्च पूछिए तो इस लहू में, जो वहाँ बहा है, हमारे अपने ही हाथ रंगे हुए नज़र आते हैं। ख़ैर !.......<br />डिप्टी कमिशनर साहब का बंगला सिविल लाइन्स में था। हर बड़ा अफ़सर और हर बड़ा टोडी शहर के इस अलग-थलग हिस्से में रहता था.... आप ने अमृतसर देखा है तो आप को मालूम होगा कि शहर और सिविल लाइन्स को मिलाने वाला एक पुल है जिसपर से गुज़रकर आदमी ठण्डी सड़क पर पहुँचता है। जहाँ हाकिमों ने अपने लिए ये अर्ज़ी जन्नत बनाई हुई थी।<br />हुजूम जब हाल दरवाज़े के क़रीब पहुँचा तो मालूम हुआ कि पुल पर घुड़सवार गोरों का पहरा है। हुजूम बिलकुल न रूका और बढ़ता गया। भाईजान, मैं इसमें शामिल था। जोश कितना था, मैं बयान नहीं कर सकता, लेकिन सब निहत्थे थे। किसी के पास एक मामूली छड़ी तक भी नहीं थी। असल में वो तो सिर्फ़ इस ग़रज़ से निकले थे कि इजतिमाई तौर पर अपनी आवाज़ हाकिम-ए-शहर तक पहुँचाएँ और उस से दरख़ास्त करें कि डाक्टर किचलू और डाक्टर सत्यपाल को ग़ैर मशरूत तौर पर रिहा कर दे। हुजूम पुल की तरफ़ बढ़ता रहा। लोग क़रीब पहुँचे तो गोरों ने फ़ायर शुरू कर दिए। इससे भगदड़ मच गई। वो गिनती में सिर्फ़ बीस-पच्चीस थे और हुजूम सैंकड़ों पर मुश्तमिल था, लेकिन, भाई, गोली की दहश्त बहुत होती है। ऐसीअफ़रा-तफ़री फैली कि अलामां, कुछ गोलियों से घायल हुए और कुछ भगदड़ में ज़ख़्मी हुए।<br />दाएँ हाथ को गन्दा नाला था। धक्का लगा तो मैं उस में गिर पड़ा। गोलियाँ चलनी बन्द हुईं तो मैंने उठ कर देखा। हुजूम तितर बितर हो चुका था।ज़ख़्मी सड़क पर पड़े थे और पुल पर गोरे खड़े हँस रहे थे। भाईजान, मुझे क़तई याद नहीं कि उस वक़्त मेरी दिमाग़ी हालत किस क़िस्म की थी।मेरा ख़्याल है कि मेरे होश-ओ-हवास पूरी तरह सलामत नहीं थे। गन्दे नाले में गिरते वक़्त तो मुझे कतई होश नहीं था। जब बाहर निकला तो जो हादिसा वक़ूअ पज़ीर हुआ था, उस के ख़द्द-ओ-ख़ाल आहिस्ता-आहिस्ता दिमाग़ में उभरने शुरू हुए।<br />दूर शोर की आवाज़ सुनाई दे रही थी, जैसे बहुत से लोग ग़ुस्से में चीख़-चिल्ला रहे हैं। मैं गंदा नाला उबूर करके ज़ाहिरा पीर के तकिए से होता हुआ हाल दरवाज़े के पास पहुँचा तो देखा कि तीस चालीस नौजवान जोश में भरे पत्थर उठा-उठा कर दरवाज़े के घड़ियाल पर मार रहे हैं। उस का शीशा टूट कर सड़क पर गिरा तो एक लड़के ने बाकियों से कहा &mdash; चलो.... मलिका का बुत तोड़ें!<br />दूसरे ने कहा &mdash; नहीं यार.... कोतवाली को आग लगाएँ!<br />तीसरे ने कहा &mdash; और सारे बैंकों को भी!<br />चौथे ने उन को रोका &mdash; ठहरो.... इस से क्या फ़ायदा... चलो पुल पर उन लोगों को मारें।<br />मैंने उस को पहचान लिया। ये थैला कंजर था.... नाम मोहम्मद तुफ़ैल था, मगर थैला कंजर के नाम से मशहूर था। इस लिए कि एक तवाइफ़ के बतन से था। बड़ा आवारागर्द था। छोटी उम्र ही में उस को जोय और शराबनोशी की लत पड़ गई थी। इस की दो बहनें शमशाद और अलमास अपने वक़्त की हसीन-तरीन तवाइफ़ें थीं। शमशाद का गला बहुत अच्छा था। उस का मुजरा सुनने के लिए रईस बड़ी-बड़ी दूर से आते थे। दोनोंअपने भाई के करतूतों से बहुत नालाँ थीं। शहर में मशहूर था कि उन्होंने एक क़िस्म का उस को आक़ कर रखा है। फिर भी वो किसी न किसी हीले अपनी ज़रूरीयात के लिए उन से कुछ न कुछ वसूल कर ही लेता था। वैसे वो बहुत ख़ुशपोश रहता था। अच्छा खाता था, अच्छा पीता था। बड़ा नफ़ासत-पसन्द था। हँसोड़पन और लतीफ़ागोई मिज़ाज में कूट-कूट के भरी थी। मीरासियों और भाण्डों के सोक़यानापन से बहुत दूर रहता था।लम्बा क़द, भरे-भरे हाथ-पाँव, मज़बूत कसरती बदन। नाक नक़्शे का भी ख़ासा था।<br />पुरजोश लड़कों ने उस की बात न सुनी और मलिका के बुत की तरफ़ चलने लगे। उस ने फिर उनसे कहा &mdash; मैंने कहा मत ज़ाए करो अपना जोश। इधर आओ मेरे साथ.... चलो उन को मारें, जिन्होंने हमारे बेक़सूर आदमियों की जान ली है और उन्हें ज़ख़्मी किया है..... ख़ुदा की क़सम, हम सब मिलकर उनकी गर्दन मरोड़ सकते हैं... चलो!<br />कुछ लड़के रवाना हो चुके थे। बाक़ी रुक गए। थैला पुल की तरफ़ बढ़ा तो वे सब उस के पीछे चलने लगे। मैंने सोचा कि माँओं के ये लाल बेकार मौत के मुँह में जा रहे हैं। मैं फव्वारे के पास दुबका खड़ा था। वहीं से मैंने थैले को आवाज़ दी और कहा &mdash; मत जाओ यार... क्यों अपनी और उनकी जान के पीछे पड़े हो।<br />थैले ने यह सुनकर एक अजीब-सा क़हक़हा बुलन्द किया और मुझ से कहा &mdash; थैला सिर्फ़ ये बताने चला है कि वो गोलियों से डरने वाला नहीं। फिर वो अपने साथियों से मुख़ातिब हुआ &mdash; तुम डरते हो तो वापस जा सकते हो।<br />ऐसे मौक़ों पर बढ़े हुए क़दम उल्टे कैसे हो सकते हैं। और फिर वो भी उस वक़्त जब लीडर अपनी जान हथेली पर रख कर आगे-आगे जा रहा हो।थैले ने क़दम तेज़ किए तो उसके साथियों को भी करने पड़े।<br />हाल दरवाज़े से पुल का फ़ासला कुछ ज़्यादा नहीं.... होगा कोई साठ-सत्तर गज़ के क़रीब.... थैला सब से आगे-आगे था। जहाँ से पुल का दोरौया मुतवाज़ी जंगला शुरू होता है, वहाँ से पन्द्रह- बीस क़दम के फ़ासले पर दो घुड़सवार गोरे खड़े थे। थैला नारे लगाता जब बंगले के आग़ाज़ के पास पहुँचा तो फ़ायर हुआ, मैं समझा कि वो गिर पड़ा है... लेकिन देखा कि वो उसी तरह.... ज़िन्दा आगे बढ़ रहा है। उसके बाक़ी साथी डर के भाग उठे हैं। मुड़कर उसने पीछे देखा और चिल्लाया &mdash; भागो नहीं.... आओ!<br />उस का मुँह मेरी तरफ़ था कि एक और फ़ायर हुआ। पलट कर उसने गोरों की तरफ़ देखा और पीठ पर हाथ फेरा... भाईजान, नज़र तो मुझे कुछ नहीं आना चाहिए था, मगर मैंने देखा कि उस की सफ़ेद बोसकी की क़मीज़ पर लाल-लाल धब्बे थे.... वो और तेज़ी से बढ़ा, जैसे ज़ख़्मी शेर... एक और फ़ायर हुआ। वो लड़खड़ाया मगर एकदम क़दम मज़बूत करके वो घुड़सवार गोरे पर लपका और एकाएक न जाने क्या हुआ.... घोड़े की पीठ ख़ाली थी। गोरा ज़मीन पर था और थैला उस के ऊपर.... दूसरे गोरे ने, जो क़रीब था और पहले बौखला गया था, बिदकते हुए घोड़े को रोका और धड़ाधड़ फ़ायर शुरू कर दिए.... इस के बाद जो कुछ हुआ मुझे मालूम नहीं। मैं वहाँ फव्वारे के पास बेहोश हो कर गिर पड़ा।<br />भाईजान, जब मुझे होश आया तो में अपने घर में था। चन्द पहचान केआदमी मुझे वहाँ से उठा लाए थे। उन की ज़बानी मालूम हुआ कि पुल पर से गोलियाँ खाकर हुजूम उग्र हो गया था। नतीजा इसका ये हुआ कि मलिका के बुत को तोड़ने की कोशिश की गई। टाउन हाल और तीन बैंकों को आग लगी और पाँच या छह यूरोपियन मारे गए। ख़ूब लूट मची।<br />लूट-खसोट का अँग्रेज़ अफ़सरों को इतना ख़याल नहीं था। पाँच या छःयूरोपियन हलाक हुए थे। इस का बदला लेने के लिए ही जलियाँवाला बाग़ का ख़ूनीं हादिसा हुआ। डिप्टी कमिशनर बहादुर ने शहर की बागडोर जनरल डावर के सपुर्द कर दी। चुनांचे जनरल साहिब ने बारह अप्रैल को फ़ौजियों के साथ शहर के मुख़्तलिफ़ बाज़ारों में मार्च किया और दर्जनों बेगुनाह आदमी गिरफ़्तार किए। तेरह को जलियाँवाला बाग़ में जलसा हुआ। क़रीब-क़रीब पच्चीस हज़ार का मजमा था। शाम के क़रीब जनरल डावर मुसल्लह गोरों और सिखों के साथ वहाँ पहुँचा और निहत्थे आदमियों पर गोलियों की बारिश शुरू कर दी।<br />उस वक़्त तो किसी को इसका ठीक-ठीक अन्दाज़ा नहीं था कि कितने आदमी मारे गए हैं। लेकिन बाद में जब जाँच हुई तो पता चला कि एक हज़ार हलाक हुए हैं और तीन या चार हज़ार के क़रीब ज़ख़्मी.... लेकिन मैं थैले की बात कर रहा था...। भाईजान, आँखों देखी आप को बता चुका हूँ... बे-ऐब ज़ात ख़ुदा की है। मरहूम में चारों ऐब शरई थे। एक पेशा तवाइफ़ के बतन से था मगर जियाला था.... मैं अब यक़ीन के साथ कह सकता हूँ कि इस मलऊन गोरे की पहली गोली भी उस को लगी थी। आवाज़ सुन कर उस ने जब पलटकर अपने साथियों की तरफ़ देखा था, और उन्हें हौसला दिलाया था, तब जोश की हालत में उस को मालूम नहीं हुआ था कि उसकी छाती में गर्म-गर्म सीसा उतर चुका है। दूसरी गोली उस की पीठ में लगी। तीसरी फिर सीने में.... मैंने देखा नहीं, पर सुना है जब थैले की लाश गोरे से जुदा की गई तो उसके दोनों हाथ उस की गर्दन में इस बुरी तरह से पैवस्त थे कि अलहदा ही नहीं होते थे.... गोरा तब जहन्नुम में जा चुका था...।<br />दूसरे रोज़, जब थैले की लाश कफ़न-दफ़न के लिए उस के घर वालों के सुपुर्द की गई तो उसका बदन गोलियों से छलनी हो रहा था.... दूसरे गोरे ने तो अपना पूरा पिस्तौल ही उस पर ख़ाली कर दिया था... मेरा ख़याल है, उस वक़्त मरहूम की रूह क़फ़स-ए-उंसुरी से परवाज़ कर चुकी थी। इस शैतान के बच्चे ने सिर्फ़ उस के मुर्दा जिस्म पर चाँदमारी की थी।<br />कहते हैं, जब थैले की लाश मुहल्ले में पहुँची तो कुहराम मच गया। अपनी बिरादरी में वो इतना मक़बूल नहीं था, लेकिन उस की क़ीमा-क़ीमा लाश देखकर सब धाड़ें मार-मार कर रोने लगे। उस की बहनें शमशाद और अलमास तो बेहोश हो गईं। जब जनाज़ा उठा तो इन दोनों ने ऐसे बीन किए कि सुनने वाले लहू के आँसू रोते रहे।<br />भाईजान, मैंने कहीं पढ़ा था कि फ़्राँस के इन्क़लाब में पहली गोली वहाँ की एक टखयाई को लगी थी। मरहूम मुहम्मद तुफ़ैल एक तवाइफ़ का लड़का था। इन्क़लाब की इस जद्द-ओ-जहद में उसको जो पहली गोली लगी थी, दसवीं थी या पचासवीं। इस के मुताल्लिक़ किसी ने भी तहक़ीक़ नहीं की। शायद इसलिए कि सोसाइटी में इस ग़रीब का कोई रुतबा नहीं था। मैं तो समझता हूँ कि पंजाब के इस ख़ूनीं ग़ुसल में नहाने वालों की फ़हरिस्त में थैले कंजर का नाम-ओ-निशान तक भी नहीं होगा... और ये भी कोई पता नहीं कि ऐसी कोई फ़हरिस्त तैयार भी हुई थी।<br />सख़्त हंगामी दिन थे। फ़ौजी हुकूमत का दौर-दौरा था। वो देव, जिसे मार्शल लॉ कहते हैं, शहर के गली-गली कूचे-कूचे में डकारता फिरता था। बहुत अफ़रा-तफ़री के आलम में उस ग़रीब को जल्दी-जल्दी यूँ दफ़न किया गया, जैसे उसकी मौत उसके सोगवार अज़ीज़ों का एक संगीन जुर्म थी जिसके निशानात वो मिटा देना चाहते थे।<br />बस भाईजान, थैला मर गया। थैला दफ़ना दिया गया और.... और ये कहकर मेरा हमसफ़र पहली मर्तबा कुछ कहते-कहते रुका और ख़ामोश हो गया। ट्रेन दनदनाती हुई जा रही थी। पटरियों की खटाखट ने ये कहना शुरू कर दिया। थैला मर गया... थैला दफ़ना दिया गया.... थैला मर गया.... थैला दफ़ना दिया गया। इस मरने और दफ़नाने के दरमयान कोई फ़ासला नहीं था, जैसे वो इधर मरा और उधर दफ़ना दिया गया। और खट-खट के साथ इन अलफ़ाज़ की हम-आहंगी कुछ इस क़दर जज़्बात से आरी थी कि मुझे अपने दिमाग़ से इन दोनों को जुदा करना पड़ा। चुनाँचे मैंने अपने हम-सफ़र से कहा &mdash; आप कुछ और भी सुनाने वाले थे?<br />चौंक कर उस ने मेरी तरफ़ देखा और बोला &mdash; जी हाँ.... इस दास्तान का एक अफ़सोसनाक हिस्सा बाक़ी है।<br />मैंने पूछा &mdash; वह क्या?<br />उस ने कहना शुरू किया &mdash; मैं आप से अर्ज़ कर चुका हूँ कि थैले की दो बहनें थीं। शमशाद और अलमास। बहुत ख़ूबसूरत थीं। शमशाद लम्बी थी।पतले-पतले नक़्श। ग़लाफ़ी आँखें। ठुमरी बहुत ख़ूब गाती थी। सुना है, ख़ाँ साहब, फ़तह अली ख़ां से तालीम लेती रही थी। दूसरी अलमास थी। उस के गले में सुर नहीं था, लेकिन नाचने में अपना सानी नहीं रखती थी। मुजरा करती थी तो ऐसा लगता था कि इस का अंग-अंग बोल रहा है। हर भाव में एक घात होती थी.... आँखों में वो जादू था जो हर एक के सर पर चढ़ के बोलता था।<br />मेरे हमसफ़र ने तारीफ़-ओ-तौसीफ में कुछ ज़रूरत से ज़्यादा वक़्त लिया। मगर मैंने टोकना मुनासिब न समझा। थोड़ी देर के बाद वो ख़ुद इस लम्बे चक्कर से निकला और दास्तान के अफ़सोनाक हिस्से की तरफ़ आया &mdash; क़िस्सा यह है, भाईजान, कि इन आफ़त की परकाला दो बहनों के हुस्न-ओ-जमाल का ज़िक्र किसी ख़ुशामदी ने फ़ौजी अफ़सरों से कर दिया.... बल्वे में एक मेम.... क्या नाम था उस चुड़ैल का?मिस....मिस शेरवुड मारी गई थी.... तय ये हुआ कि उन को बुलवाया जाए और.... और.... जी भर के इंन्तकाम लिया जाए.... आप समझ गए ना, भाई जान?<br />मैंने कहा &mdash; जी हाँ!<br />मेरे हमसफ़र ने एक आह भरी &mdash; ऐसे नाज़ुक मामलों में तवाइफ़ें और कस्बियाँ भी अपनी माँएँ-बहनें होती हैं.... मगर भाईजान ये मुल्क अपनी इज़्ज़त-ओ-नामूस को, मेरा ख़्याल है, पहचानता ही नहीं। जब ऊपर से इलाक़े के थानेदार को आर्डर मिला तो वो फ़ौरन तैयार हो गया। चुनांचे वो ख़ुद शमशाद और अलमास के मकान पर गया और कहा कि साहब लोगों ने याद किया है। वो तुम्हारा मुजरा सुनना चाहते हैं... भाई की क़ब्र की मिट्टी भी अभी तक ख़ुशक नहीं हुई थी। अल्लाह को प्यारा हुए उस ग़रीब को सिर्फ़ दो दिन हुए थे कि ये हाज़िरी का हुक्म सादिर हुआ कि आओ हमारे हुज़ूर नाचो.... अज़िय्यत का इससे बढ़ कर पुर-अज़िय्यत तरीक़ा क्या हो सकता है....? मुस्तबइद तम्सख़ुर की ऐसी मिसाल, मेरा ख़्याल है, शायद ही कोई और मिल सके.... क्या हुक्म देने वालों को इतना ख़याल भी न आया कि तवाइफ़ भी ग़ैरतमन्द होती है? ....हो सकती है... क्यों नहीं हो सकती? उस ने अपने आप से सवाल किया, लेकिन मुख़ातिब वो मुझसे ही था।<br />मैंने कहा &mdash; हाँ, हो सकती है!<br />&mdash; जी हाँ ....थैला आख़िर इन का भाई था। उस ने किसी की मार ख़ाने की लड़ाई-भिड़ाई में अपनी जान नहीं दी थी। वो शराब पी कर दंगा-फ़साद करते हुए हलाक नहीं हुआ था। उसने वतन की राह में बड़े बहादुराना तरीक़े पर शहादत का जाम पिया था। वो एक तवाइफ़ के बतन से था। लेकिन वो तवाइफ़ माँ थी और शमशाद और अलमास उसी की बेटियां थीं और ये थैले की बहनें थीं.... तवाइफ़ें बाद में थीं.... और वो थैले की लाश देख कर बेहोश हो गई थीं। जब उस का जनाज़ा उठा था तो उन्होंने ऐसे बीन किए थे कि सुन कर आदमी लहू रोता था....।<br />मैंने पूछा &mdash; वो गईं?<br />मेरे हमसफ़र ने इस का जवाब थोड़े वक़फ़े के बाद उदासी से दिया &mdash; जी हाँ... जी हाँ गईं... ख़ूब सज बनकर। एक दम उसकी उदासी गहरी हो गई &mdash; सोलह सिंगार करके अपने बुलाने वालों के पास गईं.... कहते हैं कि ख़ूब महफ़िल जमी.... दोनों बहनों ने अपने जौहर दिखाए.... ज़रक़-बरक़ पिशवाज़ों में मलबूस वो कोह-ए-क़ाफ़ की परियाँ मालूम होती थीं....शराब के दौर चलते रहे और वो नाचती-गाती रहीं... ये दोनों दौर चलते रहे .... और कहते हैं कि.... रात के दो बजे एक बड़े अफ़सर के इशारे पर महफ़िल बरख़ास्त हुई...।<br />मेरा हमसफ़र उठ खड़ा हुआ और बाहर भागते हुए दरख़्तों को देखने लगा।पहियों और पटरियों की आहनी गड़गड़ाहट की ताल पर उसके आख़िरी दो लफ़्ज़ नाचने लगे &mdash; बरख़ास्त हुई... बरख़ास्त हुई।<br />मैंने अपने दिमाग़ में उन्हें, आहनी गड़गड़ाहट से नोच कर अलहदा करते हुए उससे पूछा &mdash; फिर क्या हुआ?<br />भागते हुए दरख़्तों और खम्भों से नज़रें हटा कर उस ने बड़े मज़बूत लहजे में कहा &mdash; उन्होंने अपनी ज़रक़-बरक़ पिशवाज़ें नोच डालें और अलिफ़ नंगी हो गईं और कहने लगीं.... लो देख लो... हम थैले की बहनें हैं.... उस शहीद की, जिसके ख़ूबसूरत जिस्म को तुमने सिर्फ़ इसलिए अपनी गोलियों से छलनी-छलनी किया था कि उसमें वतन से मोहब्बत करने वाली रूह थी... हम उसी की ख़ूबसूरत बहनें हैं... आओ, अपनी शहवत के गर्म-गर्म लोहे से हमारा ख़ुशबूओं में बसा हुआ जिस्म दागदार करो.... मगर ऐसा करने से पहले सिर्फ़ हमें एक बार अपने मुँह पर थूक लेने दो...।<br />यह कहकर वो ख़ामोश हो गया। कुछ इस तरह कि और नहीं बोलेगा। मैंने फ़ौरन ही पूछा &mdash; फिर क्या हुआ?<br />उस की आँखों में आँसू डबडबा आए &mdash; उनको.... उनको गोली से उड़ा दिया गया।<br />मैंने कुछ न कहा। गाड़ी आहिस्ता होकर स्टेशन पर रुकी तो उस ने क़ुली बुलाकर अपना अस्बाब उठवाया। जब जाने लगा तो मैं ने उस से कहा &mdash; आपने जो दास्तान सुनाई, इस का अंजाम मुझे आप का ख़ुदसाख़्ता मालूम होता है।<br />एकदम चौंककर उसने मेरी तरफ़ देखा &mdash; ये आप ने कैसे जाना?<br />मैंने कहा &mdash; आप के लहजे में एक नाक़ाबिल-ए-बयान कर्ब था।<br />मेरे हमसफ़र ने अपने हलक़ की तल्ख़ी थूक के साथ निगलते हुए कहा &mdash; जी हाँ... उन हराम..., वो गाली देते-देते रुक गया &mdash; उन्होंने अपने शहीद भाई के नाम पर बट्टा लगा दिया।<br />यह कहकर वो प्लेटफार्म पर उतर गया।<br />(11-12 अक्तूबर1951 ईस्वी)</p>

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  3. अक्ल दाढ़

    आप मुँह सुजाये क्यों बैठे हैं?भई दाँत में दर्द हो रहा है तुम तो ख़्वाह-मख़्वाह ।

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  4. अनार कली

    नाम उस का सलीम था मगर उस के यार दोस्त उसे शहज़ादा सलीम कहते थे। ग़ालिबन इस लिए कि उस के ख़द-ओ-ख़ाल मुग़लई थे ख़ूबसूरत था। चाल ढाल से राऊनत टपकती थी।उस का बाप पीडब्ल्यू डी के दफ़्तर में मुलाज़िम था। तनख़्वाह ज़्यादा से ज़्यादा सौ रुपय होगी मगर बड़े ठाट से रहता ज़ाहिर है कि रिश्वत खाता था यही वजह है कि सलीम अच्छे से अच्छा कपड़ा पहनता जेब ख़र्च भी उस को काफ़ी मिलता इस लिए कि वो अपने वालदैन का इकलौता लड़का था।

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  5. अंजाम-ए-नजीर

    बटवारे के बाद जब फ़िर्का-वाराना फ़सादात शिद्दत इख़्तियार कर गए और जगह जगह हिंदूओं और मुस्लमानों के ख़ून से ज़मीन रंगी जाने लगी तो नसीम अख़तर जो दिल्ली की नौ-ख़ेज़ तवाइफ़ थी अपनी बूढ़ी माँ से कहा चलो माँ यहां से चलेंबूढ़ी बाइका ने अपने पोपले मुँह में पानदान से छालिया के बारीक बारीक टुकड़े डालते हुए उस से पूछा कहाँ जाऐंगे बेटा

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उसने मिट्टी को छुआ भर था - प्रताप सोमवंशीपसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है— प्रताप सोमवंशीदर्द औरों का हम - प्रताप सोमवंशीपसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है— प्रताप सोमवंशीये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगाये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगालिबास-ए-ज़िंदगी फट जाएगा मैला नहीं होगा— मुनव्वर रानाचले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम नेचले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम नेबढ़ाने पर पतंग आए तो चर्ख़ी खोल दी हम ने— मुनव्वर रानाकुछ नहीं चाहने वाली लड़कीसोलह की यह लड़की दो-तीन साल पहले तकपेड़-पौधों पर रखती थी पाँव— ऐश्वर्य राजआंबेडकर“तुम्हारे दीन मुखों को देखकरकरुणा भरे स्वरों को सुनकर— बी. गोपाल रेड्डी