बस बची रहूँगी मैं

लीना मल्होत्रा रावलीना मल्होत्रा राव3 Oct 1968

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एक दिन जब मैं चली जाऊँगी

तो घर के किन्हीं कोनों से निकलूँगी फ़ालतू सामान में

बहुत समय से बंद पड़ी दराज़ों से

निकलूँगी किसी डायरी में लिखे हिसाब से

मेरे किसी पहने हुए कपड़े में अटकी पड़ी रहेगी मेरी ख़ुशबू

जिसे मेरे बच्चे पहन कर सो जाएँगे

जब मुझे पास बुलाना चाहेंगे

मैं उनके सपनों में आऊँगी

उन्हें सहलाने और उनक प्रश्नों का उत्तर देने

मैं बची रहूँगी शायद कुछ घटनाओं में

लोगों की स्मृतियों में उनके जीवित रहने तक

गाय की जुगाली में गिरती रहूँगी मैं

जब वह उन रोटियों को हज़म कर रही होगी

जो उसने मेरे हाथ से खाई थी

बहुत दिन तक

उन आवारा कुत्तों की उदासी में गुम पड़ी रहूँगी मैं

और मेरी सीढ़ी पर पसरे सन्नाटे में वे खोजेंगे मेरी उपस्थिति

मैं मिलूँगी

सड़क के अस्फुट स्पर्शों के ख़ज़ाने में

जब वह अपनी आहटों को जमा करने के लिए

खोलेगी अपनी तिजोरी

पेड़ की उन जड़ों में जिन्हें मैंने सींचा था

उसके किसी रेशे की मुलायम याद में

पड़ी मिलूँगी मैं एक लंबे अरसे तक

किसी बच्चे की मुस्कुराहट में बजूँगी मंदिर की घंटी जैसी

बस बची रहूँगी मैं प्रेम में

जो मैंने बाँटा था अपने होने से...

दिया था इस सृष्टि को

तब ये सृष्टि देगी मुझे

मेरे चुक जाने के बाद बचाए रखेगी मुझे।

लीना मल्होत्रा राव
About the poet

लीना मल्होत्रा राव

सुपरिचित कवयित्री। स्त्रीवादी संवेदना-सरोकारों के लिए उल्लेखनीय। मूल नाम : लीना मल्होत्रा राव जन्म : 03/10/1968 | गुरुग्राम, हरियाणा कविताओं के सोशल मीडिया दौर में पहले-पहल सामने आईं सुपरिचित कवयित्री लीना मल्होत्रा राव का जन्म 3 अक्टूबर 1968 को गुड़गाँव, हरिय…

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