शोभित उद्यान मध्य भारत के
ख्यात बकुल का
सुंदर पौधा एक
रोपा था छाया की आकांक्षा से
ऋतु आई, पर न हुआ अंकुरित,
आया वसंत, न पल्लवित फिर भी,
लगे मानने परजीवी
पुष्प-रूप-अनभिज्ञ परदेसी।
पछवा की मृदु गति से,
शीतल-सुगन्धित मलय-पवन से
अनजान पुष्प-पौधा
हुआ मुकुलित सुकोमल कलियों में!
हुआ होता प्रफुल्ल वसंत-प्रभात में,
ऊष्णता के भय से तीक्ष्ण धूप की
न फूला समय पर!
देखता होगा राह समय की,
पुष्प विद्याविद परदेसी हे
विचारते अभी भी परजीवी इसे!








