उज्जीवन

होमेन बरगोहाईहोमेन बरगोहाई

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सूर्य-स्नात किसी एक नए दिन की हँसी की सिंफनी

रात का तुहिन-स्पर्श तोड़कर भाग आती है

रंग उगता है किसी एक बधिर संध्या के पाण्डुर मुँह में।

रात का वक्ष विदीर्ण है, राजपथ मुखरित है, स्वप्न की लिचि है।

सद्यमृत कामना शववाही इकट्ठी है (किसकी कामना १)

दीवार में कंकाल की छायाएँ इकट्ठी गल-गलकर बहती

भय, मुझे भय होता है, हाय। तुम सामने नहीं हो।

अचानक चमक गया सुप्त प्राण जन अरण्य का

मुक्त द्वार प्रभात का, विपण्ण विक्षिप्त समारोह

पलातक कामना का, पराजित वंध्या वासना का।

अपूर्व उज्ज्वल दिन है, राजपथ काँपता है, आशा की छलना

मनोहारी दूकान में उपवासी आकांक्षा की भीड़ है।

दीवार में इश्तहार, मैदान में जन सभा, लाल झंडा उड़ता है

मुझे भय लगता है—संगी है सिर्फ़ दिन का अँधेरा।

होमेन बरगोहाई
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होमेन बरगोहाई

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