उठे बादल, झुके बादल

हरिनारायण व्यासहरिनारायण व्यास14 Sept 1923 – 14 Sept 2013

1 min read · 12.4K reads

उधर उस नीम की कलगी पकड़ने को

झुके बादल।

नई रंगत सुहानी चढ़ रही है

सब के माथे पर।

उड़े बगुले, चले सारस,

हरस छाया किसानों में।

बरस भर की नई उम्मीद

छाई है बरसने के तरानों में।

बरस जा रे, बरस जा ओ नई दुनिया के

सुख संबल।

पड़े हैं खेत छाती चीर कर

नाले-नदी सूने।

बिलखते दादुरों के साथ सूखे झाड़

रूखे झाड़।

हवा बेजान होकर सिर पटकती

रो रही सरसर।

ज़मीं की धूल है बदहोश

भूली आज अपना घर।

किलकता आ, बरसता आ,

हमारी ओ ख़ुशी बेकल।

उधर वह आम का झुरमुट

वहीं हैं पास में पनवट।

किलकती कोकिला, बेमान होकर देखती जब

चाँद मुखड़े पर घटा-सी छा गई है लट।

खड़ी हैं सिर लिए गागर

तुम्हारी इंतज़ारी में

दरद करती कमर, दिल काँपता है

बेक़रारी में।

जहाँ की बादशाही भी जहाँ पर।

सिर झुकाती है

उन्हीं कोमल किशोरी का

दुखा कर दिल

कभी रस ले सकोगे क्या अरे बेदिल?

उठे बादल, झुके बादल।

हरिनारायण व्यास
About the poet

हरिनारायण व्यास

View profile & all 10 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like

ये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगाये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगालिबास-ए-ज़िंदगी फट जाएगा मैला नहीं होगा— मुनव्वर रानाचले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम नेचले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम नेबढ़ाने पर पतंग आए तो चर्ख़ी खोल दी हम ने— मुनव्वर रानाकुछ नहीं चाहने वाली लड़कीसोलह की यह लड़की दो-तीन साल पहले तकपेड़-पौधों पर रखती थी पाँव— ऐश्वर्य राजआंबेडकर“तुम्हारे दीन मुखों को देखकरकरुणा भरे स्वरों को सुनकर— बी. गोपाल रेड्डीमेरा और मेरी पृथ्वी का(लंबी कविता के कुछ अंश)वैसा ही हूँ, दुख मेरी गोद का बच्चा, बार-बार— हीरेन भट्टाचार्यतालाब-1मैं क्षिति तल परतुम्हारे सुख-दुख का— ब्रजरतन जोशी