एक औरत की हँसी - फ़हमीदा रियाज़

फ़हमीदा रियाज़फ़हमीदा रियाज़28 Sept 1946 – 21 Sept 2018

3 min read · 12.4K reads

पथरीले कोहसार के गाते चश्मों में
गूँज रही है एक औरत की नर्म हँसी
दौलत ताक़त और शोहरत सब कुछ भी नहीं
उस के बदन में छुपी है उस की आज़ादी

दुनिया के मा’बद के नए बुत कुछ कर लें
सुन नहीं सकते उस की लज़्ज़त की सिसकी
इस बाज़ार में गो हर माल बिकाऊ है
कोई ख़रीद के लाए ज़रा तस्कीन उसकी

इक सरशारी जिस से वो ही वाक़िफ़ है
चाहे भी तो उस को बेच नहीं सकती
वादी की आवारा हवाओ आ जाओ
आओ और उस के चेहरे पर बोसे दो

अपने लम्बे-लम्बे बाल उड़ाती जाए
हवा की बेटी साथ हवा के गाती जाए
फ़हमीदा रियाज़
About the poet

फ़हमीदा रियाज़

View profile & all 63 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like

डर की कहानीबच्ची माँ के गले से झूलती कहती है,‘माँ, तुम डरो मत।’— बीरेंद्र चट्टोपाध्यायवह कर गया पारउसके पूरे परिवार का अपहरण कर लिया गया।उसने बेगार से कर दिया था इंकार।— फ़रीद ख़ाँमाफ़ीसबसे पहले मैं माफ़ी माँगता हूँ हज़रत हौव्वा से।मैंने ही अफ़वाह उड़ाई थी कि उस ने आदम को बहकाया था— फ़रीद ख़ाँमैं इक्कीसवीं सदी का एक दृश्य हूँपत्नी के शव को अकेले कंधे पर ले जाते हुए दाना माँझी को टी.वी. पर देखते हुएमैं बहुत देर तक अपने कंधे के विकल्प ढूँढ़ता रहा— हरीशचंद्र पांडेयमुना इलाहाबाद में, संगम होती हुईयमुना इलाहाबाद मेंकभी-कभी मुझे यह साफ़ आसमान से काटी गई एक हल्की— हरीशचंद्र पांडेसमझ लेना किअपरिचित लोगों से भी हो जाते हैं अपनेपरिचित रिश्ते— हरि मृदुल