अपनी हड्डियों से दुनिया थहाने
का वक़्त नहीं है, लड़खड़ाते
पैरों से राह नापने का वक़्त
यह नहीं है, चोरों को सुविधा
मिली है और तुम्हें
हकारता हुआ देखता हूँ
यह देश बहुत बड़ा है
तुम अपनी भूख से इसे
भर नहीं सकते।
आओ अचरज वहाँ पड़ा है, उसमें
जहाँ बनिये की आँख बनैले जानवर-
सी जल रही है।
आओ! मेरी आत्मा अंधी है
मेरा दुख पीठ पर बँधा है
वसंत सिर्फ़ पेड़ों की आदत का
हिस्सा है,
जहाँ छायाओं में झुलसे हुए
चेहरे लेटे हुए हैं।








