हमारे पास मत आओ

बोधिसत्वबोधिसत्व11 Sept 1968

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लोग जा रहे हैं

लाखों लोग जा रहे हैं

पैदल उदास

भूल कर भूख प्यास

दिशा समय धूप छाले

भूल कर चलते जा रहे हैं!

मैं कुछ दूर भाग कर चलता हूँ उनकी दिशा में

जैसे मृतक के साथ चलने का रिवाज है

मैं चलता हूँ चालीस क़दम उनकी ओर

कुछ एक को देना चाहता हूँ कंधा

किंतु यह सब किए बिना

लौट आता हूँ ख़ुद तक!

ख़ुद को कंधा देता हुआ पाता हूँ!

वे सब मेरे भाई हैं

वे सब मेरे गाँव के हैं

वे सब मैं हूँ!

वह भीड़ मैं हूँ!

वे छाले मेरे पैरों में हैं

वह पानी पीने को अंजुलि पसारे बैठा मैं ही हूँ

वह रास्ते में रो रही है मेरी माँ

वह दूर गिरा है मेरे बेटे का शरीर निर्जल

वह मेरी बेटी एक राख के चट्टान पर शून्य बैठी है!

उसकी दृष्टि में धूल और राख भरी है

वह रोती है राख के आँसू!

वह देखो अपने गर्भ को सम्हाले जा रही है मेरी माँ!

उससे जन्म लूँगा मैं पैदल यात्रा में मरने के लिए!

रास्ते में कोई नहीं गाएगा मेरे जन्म-मरण का सोहर!

इस तीन रंग वाले चक्रधारी झंडे के देश में

ऐसे जाने का कोई निशान नहीं मिलता

न राम ऐसे गए थे

न पांडव न सिद्धार्थ गौतम

हम एक ऐतिहासिक दृश्य हो गए हैं

सुखी लोगों को चमत्कृत करते

समाचारों के लिए ऊब

और सरकारों के लिए सूखी दूब हम!

बहुत दूर है अपनी अयोध्या

बहुत दूर है अपनी मिथिला

रावण खरदूषण के जंगल में घिर गए हैं हम

कि निहत्थे हम पैदल हम भूखे हम

हमारे धनुष-बाण हमने ख़ुद खोए हैं

यह वनवास हमने ख़ुद लिया था

यह वापसी हमारी अपनी है

हम हारे हुए राम हैं भाई

हमारे पुष्पक विमान रावणों की क़ैद में हैं

कितने विभीषण कितने हनुमान कितने बालि कितने सुग्रीव सभी रावणों से संधि करके पा गए हैं राज्य!

अब नहीं जलती लंका

उसके चौकीदार हम ही थे

उसी लंका से खदेड़े हुए हम

निष्कासित हम

पैदल-पैदल अपनी अयोध्या जा रहे हैं!

छालों के जूते पहन कर

उदासी का मुकुट बाँधे

पराजय का प्रशस्ति-पत्र गले में लटकाए

अश्वमेघ के बलि अश्व की तरह

अपनी भूमि की ओर खिसक रहे हैं हम।

हम लाखों लोग

हम अबोध बच्चे

हम बूढ़े लोग

हम युवतियाँ

हम बहुएँ

हम पराजित पुरुष

हम बिके हुए अवध-मिथिला के लोग

हम प्राण बचाते निर्लज्ज अपना घाव दिखाते

यहाँ-वहाँ धक्का खाते

पेट बजा कर पैसा पाते

घिसट घिसट पैर बढ़ाते

लाखों लोग जा रहे हैं!

हम भीड़ की फ़ोटो हैं

हम पराजय के प्रतीक हैं

हम एक देश की शवयात्रा हैं!

हमें जाते हुए देखो

और उदास हो जाओ

हमें दूर से देखो

हमारे पास मत आओ!

बोधिसत्व
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