Selected Quotes
Poetry & Stories
हिलि मिलि जानै तासोँ मिलिकै जनावै हेत - बोधा
हिलि मिलि जानै तासोँ मिलिकै जनावै हेत ,हित को न जानै ताको हितू न बिसाहिये ।
काँपत गात सकात बतात है साँकरी खोरि निशा अँधियारी - बोधा
काँपत गात सकात बतात है साँकरी खोरि निशा अँधियारी ।पातहू के खरके छरकै धरकै उर लाय रहै सुकुमारी ।
अति छीन मृनाल के तारहु ते - बोधा
अति छीन मृनाल के तारहु ते, तेहि ऊपर पाँव दै आवनो है।सुई बेह ते द्वार सकीन तहाँ, परतीति को हाँड़ो दावनो है॥
वह प्रीति की रीति को जानत थो - बोधा
वह प्रीति की रीति को जानत थो, तबहीं तो बच्यो गिरि ढाहन तैं।गजराज चिकारि कै प्रान तज्यो, न जरयो सँग होलिका दाहन तैं॥
लोक की लाज औ सोच प्रलोक को - बोधा
लोक की लाज औ सोच प्रलोक को, वारिये प्रीति के ऊपर दोऊ।गाँव को गेह को देह को नातो, सनेह मैं हाँ तो करै पुनि सोऊ ॥
बोधा: Quick Answers
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Poems & Stories by बोधा
हिलि मिलि जानै तासोँ मिलिकै जनावै हेत - बोधा
हिलि मिलि जानै तासोँ मिलिकै जनावै हेत ,हित को न जानै ताको हितू न बिसाहिये ।
काँपत गात सकात बतात है साँकरी खोरि निशा अँधियारी - बोधा
काँपत गात सकात बतात है साँकरी खोरि निशा अँधियारी ।पातहू के खरके छरकै धरकै उर लाय रहै सुकुमारी ।
अति छीन मृनाल के तारहु ते - बोधा
अति छीन मृनाल के तारहु ते, तेहि ऊपर पाँव दै आवनो है।सुई बेह ते द्वार सकीन तहाँ, परतीति को हाँड़ो दावनो है॥
वह प्रीति की रीति को जानत थो - बोधा
वह प्रीति की रीति को जानत थो, तबहीं तो बच्यो गिरि ढाहन तैं।गजराज चिकारि कै प्रान तज्यो, न जरयो सँग होलिका दाहन तैं॥
लोक की लाज औ सोच प्रलोक को - बोधा
लोक की लाज औ सोच प्रलोक को, वारिये प्रीति के ऊपर दोऊ।गाँव को गेह को देह को नातो, सनेह मैं हाँ तो करै पुनि सोऊ ॥
कहिबे को ब्यथा सुनिबे को हँसी - बोधा
कहिबे को ब्यथा सुनिबे को हँसी, को दया सुनि कै उर आनतु है।अरु पीर घटै तजि धीर सखी, दु:ख को नहीं का पै बखानतु है॥
कूर मिले मगरूर मिले - बोधा
कूर मिले मगरूर मिले, रनसूर मिले धरे सूर प्रभा को।ज्ञानी मिले औ गुमानी मिले, सनमानी मिले छबिदार पता को॥
खरी सासु घरी न छमा करिहैं - बोधा
खरी सासु घरी न छमा करिहैं, निसिबासर त्रासन हीं मरबी।सदा भौंहे चरहै ननदी, यों जेठानी की तीखी सुनै जरबी॥
कबँ मिलिबो कबँ मिलिबो - बोधा
कबहूँ मिलिबो, कबहूँ मिलिबो, यह धीरज ही मैं धरैबो करै।उर ते कढ़ि आवै गरै तें फिरै, मन की मनहीं मैं सिरैबो करै॥
कूक न मारु कोइलिया - बोधा
कूक न मारु कोइलिया, करि-करि तेह ।लागि जाति बिरहिनि कै, दुबरी देह॥
Selected Quotes by बोधा (चुनिंदा उद्धरण)
लोक की लाज औ सोच प्रलोक को, वारिये प्रीति के ऊपर दोऊ।गाँव को गेह को देह को नातो, सनेह मैं हाँ तो करै पुनि सोऊ ॥अति छीन मृनाल के तारहु ते, तेहि ऊपर पाँव दै आवनो है।सुई बेह ते द्वार सकीन तहाँ, परतीति को हाँड़ो दावनो है॥कबहूँ मिलिबो, कबहूँ मिलिबो, यह धीरज ही मैं धरैबो करै।उर ते कढ़ि आवै गरै तें फिरै, मन की मनहीं मैं सिरैबो करै॥कूर मिले मगरूर मिले, रनसूर मिले धरे सूर प्रभा को।ज्ञानी मिले औ गुमानी मिले, सनमानी मिले छबिदार पता को॥काँपत गात सकात बतात है साँकरी खोरि निशा अँधियारी ।पातहू के खरके छरकै धरकै उर लाय रहै सुकुमारी ।कहिबे को ब्यथा सुनिबे को हँसी, को दया सुनि कै उर आनतु है।अरु पीर घटै तजि धीर सखी, दु:ख को नहीं का पै बखानतु है॥Videos on बोधा
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