ऐसा एक रोज़ था जब दुनिया का सब विषाद आकाश में
इकट्ठा हुआ था।
माँझी लोगों ने दुःख से अपने-अपने जानुओ में मुँह छिपाए थे,
लेकिन नावें पानी में अपने घर घूर-घूरकर बहती रहती थीं
और हिरोशिमा की सूखी चट्टानों ने उनको ढक लिया था।
कुछ दिनो से आसमान साफ़ है
कल रात को खेटी के घर के ऊपर से चाँद उग रहा था
मैंने देखा था कुहेलिका का धुआँ और धुआँ
राह-राह में जंगली फूल
दूर गाँव में स्वप्न-रता किसी एक अनुराधा का मुँह।








