डायरी

बिरेश्वर बरुआबिरेश्वर बरुआ

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ऐसा एक रोज़ था जब दुनिया का सब विषाद आकाश में

इकट्ठा हुआ था।

माँझी लोगों ने दुःख से अपने-अपने जानुओ में मुँह छिपाए थे,

लेकिन नावें पानी में अपने घर घूर-घूरकर बहती रहती थीं

और हिरोशिमा की सूखी चट्टानों ने उनको ढक लिया था।

कुछ दिनो से आसमान साफ़ है

कल रात को खेटी के घर के ऊपर से चाँद उग रहा था

मैंने देखा था कुहेलिका का धुआँ और धुआँ

राह-राह में जंगली फूल

दूर गाँव में स्वप्न-रता किसी एक अनुराधा का मुँह।

बिरेश्वर बरुआ
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बिरेश्वर बरुआ

बिरेश्वर बरुआ

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उसने मिट्टी को छुआ भर था - प्रताप सोमवंशीपसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है— प्रताप सोमवंशीदर्द औरों का हम - प्रताप सोमवंशीपसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है— प्रताप सोमवंशीमुनव्वर राना के शेरअब जुदाई के सफ़र को मिरे आसान करोतुम मुझे ख़्वाब में आ कर न परेशान करो— मुनव्वर रानाये सर-बुलंद होते ही शाने से कट गयाये सर-बुलंद होते ही शाने से कट गयामैं मोहतरम हुआ तो ज़माने से कट गया— मुनव्वर रानाकुछ नहीं चाहने वाली लड़कीसोलह की यह लड़की दो-तीन साल पहले तकपेड़-पौधों पर रखती थी पाँव— ऐश्वर्य राजप्रतिज्ञाप्रतिज्ञाएँ बहा दो पानी में लड़कीप्रतिज्ञाएँ बहाओ पानी में;— बीरेंद्र चट्टोपाध्याय