यह रात है

बसंत त्रिपाठीबसंत त्रिपाठी25 Sept 1972

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यह रात है

और न मालूम क्यों

एक बुरे दिन की आशंका

छाई है जैसे चारों ओर

शरद की पूरे चाँद की ओस गिराती रात

चीज़ें इतनी ही साफ़

जैसे पहन लिया हो पुराने नंबर का चश्मा

शांत सड़क पर

एक साइकिल सवार

चला जा रहा है घर की ओर

मैं जानता हूँ उसे

फैक्टरी की तालेबंदी के बाद

वह ए.टी.एम. के बाहर

सुबह नौ से रात बारह तक

करेंसी उगलती मशीन की सुरक्षा करता है

ओस से भीगती इस रात को

वह अपनी साइकिल की चिंचियाहट और

कर्र-किर्र से भर रहा है

मुझे हमेशा लगता है कि एक दिन

वह फट पड़ेगा

किसी पैसा निकालते हुए आदमी पर

साइकिल शायद उसकी आत्मा है

दुःख में डूबी

लगातार रोती हुई।

बसंत त्रिपाठी
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बसंत त्रिपाठी

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