भिक्षा - बालकृष्ण शर्मा नवीन

बालकृष्ण शर्मा नवीनबालकृष्ण शर्मा नवीन8 Mar 1897 – 29 Sept 1960

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भर दो, प्रिय, भर दो अंतरतर,
विश्व-वेदना के कल जल से
आप्लावित कर दो अभ्यंतर,
भर दो, प्रिय, भर दो अंतरतर।

छलका दो मेरी वाणी में
अचर-सचर की विगलित करुणा
समवेदना-भावना से तुम कंपित
कर दो यह हिय थर-थर,
भर दो, प्रिय, भर दो अंतरतर।

नभ-जल-थल से अनिल-अनल में
करुण मोहिनी छवि दिखला दो,
पुलक-पुलक बह आने दो, प्रिय,
मेरे नयनों का लघु निर्झर,
भर दो, प्रिय, भर दो अंतरतर।

इठलाते कुसुमों का मादक
परिमल मन-नभ में फैला है,
अपनी निर्गुण गंध-किरण से
चिर निर्धूम करो मम अंबर,
भर दो, प्रिय, भर दो अंतरतर।

मेरी मुग्धा व्यथा परिधिगत
हुई - उसे नि:सीम बना दो,
मुक्त करो, प्रिय, मुक्त करो मम
करुणा-वीणा के ये सुस्वर
भर दो, प्रिय, भर दो अंतरतर।
बालकृष्ण शर्मा नवीन
About the poet

बालकृष्ण शर्मा नवीन

बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' (१८९७ - १९६० ई०) हिन्दी कवि थे। वे परम्परा और समकालीनता के कवि हैं। उनकी कविता में स्वच्छन्दतावादी धारा के प्रतिनिधि स्वर के साथ-साथ राष्ट्रीय आंदोलन की चेतना, गांधी दर्शन और संवेदनाओं की झंकृतियां समान ऊर्जा और उठान के साथ सुनी जा सकती…

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