मधुमय स्वप्न रंगीले - बालकृष्ण शर्मा नवीन

बालकृष्ण शर्मा नवीनबालकृष्ण शर्मा नवीन8 Mar 1897 – 29 Sept 1960

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बन-बनकर मिट गए अनेकों मेरे मधुमय स्वप्न रंगीले
भर-भरकर फिर-फिर सूखे हैं मेरे लोचन गीले-गीले।

मेरा क्या कौशल, क्या मेरी चंचल तूली, क्या मेरे रंग
क्या मेरी कल्पना हंसिनी, मेरी क्या रस रासरति उमंग
मैं कब का रंग-रूप चितेरा, मैं कब विचर सका खग-कुल संग
मन-स्वप्नों के चित्र स्वयं ही बने स्वयं ही मिटे हठीले
भर-भरकर फिर-फिर सूखे हैं ये मेरे रंग-पात्र रंगीले।

कलाकार कब का मैं प्रियतम, कब मैंने तूलिका चलाई
मैंने कब यत्नत: कला के मंदिर में वर्तिका जलाई
यों ही कभी काँप उठ्ठी है मेरी अंगुली और कलाई
यों ही कभी हुए हैं कुछ-कुछ रसमय कुछ पाहन अरसीले!
बन-बनकर मिट गए अनेकों मेरे मधुमय स्वप्न रंगीले!

मैंने कब सजीवता फूँकी जग के कठिन शैल पाहन में
मैं कर पाया प्राणस्फुरण कब अपने अभिव्यंजन वाहन में
मुझे कब मिले सुंदर मुक्ता भावार्णव के अवगाहन में
यदा-कदा है मिले मुझे तो तुम जैसे कुछ अतिथि लजीले!
यों ही बन-बनकर बिगड़े हैं मेरे मधुमय स्वप्न रंगीले।

मेरे स्वप्न विलीन हुए हैं किंतु शेष है परछाई-सी
मिटने को तो मिटे किंतु वे छोड़ गए हैं इक झाईं-सी
उस झिलमिल की स्मृति-रेखा से हैं वे आँखे अकुलाई-सी
उसी रेख से बन उठते हैं फिर-फिर नवल चित्र चमकीले
बन-बनकर मिट गए अनेकों मेरे सपने गीले-गीले!
बालकृष्ण शर्मा नवीन
About the poet

बालकृष्ण शर्मा नवीन

बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' (१८९७ - १९६० ई०) हिन्दी कवि थे। वे परम्परा और समकालीनता के कवि हैं। उनकी कविता में स्वच्छन्दतावादी धारा के प्रतिनिधि स्वर के साथ-साथ राष्ट्रीय आंदोलन की चेतना, गांधी दर्शन और संवेदनाओं की झंकृतियां समान ऊर्जा और उठान के साथ सुनी जा सकती…

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