वे उतनी ही लड़ाकू थीं

Anuj LugunAnuj Lugun10 Jan 1986

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वे उतनी ही लड़ाकू थीं
जितना की उनका सेनापति
वे अपनी खूबसूरती से कहीं ज्यादा खतरनाक थीं
अपने जूड़े में उन्होंने
सरहुल और ईचाः बा की जगह
साहस का फूल खोंसा था
उम्मीद को उन्होंने
कानों में बालियों की तरह पिरोया था
हक की लड़ाई में
उन्होंने बोया था आत्मसम्मान का बीज,

उनकी जड़ें गहरी हो रही हैं
फैल रही हैं लतरें
गाँव-दर-गाँव
शहर-दर-शहर
छहुरों से
पगडंडियों से
गलियों से बाहर,
आँगन में गोबर पाथती माँ
सदियों बाद
स्कूल की चौखट पर पहुँची बहन
लोकल ट्रेन से कूदती हुई
दफ्तर पहुँची पत्नी
और भोर अँधेरे
दौड़-दौड़ कर खेतों की ओर
चौराहें की ओर
आवाज उठाती
सैकड़ों अपरिभाषित रिश्तों वाली औरतें
खतरनाक साबित हो रही हैं
दुःस्वप्नों के लिए
उन्होंने अपने जूड़े में
खोंस रखा है साहस का फूल
कानों में उम्मीद को
बालियों की तरह पिरोया है
धरती को सर पर घड़े की तरह ढोए
लचकती हुई चली जा रही हैं
उलगुलान की औरतें
धरती से प्यार करने वालों के लिए
उतनी ही खूबसूरत
और उतनी ही खतरनाक
धरती के दुश्मनों के लिए।

Anuj Lugun
About the poet

Anuj Lugun

Anuj Lugun (born 10 January 1986) is a Jharkhandi Indian poet and writer.[citation needed] His poetry espoused indigenous renaissance and intense rebellion against fascism and oppression. Lugun's activism for political and social justice earned him the title…

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