हमारी दुनिया में कहा जाता था
औरतों को धरती और मर्दों को आकाश।
सो हम लड़के
लगे ही रहते थे हमेशा
धरती पर पैर रख आकाश को छूने में
आकाश को पाने में
आकाश ही होने में।
और जब
कर नहीं पाते थे ये सब
झल्लाहट में कोड़ने लगते थे
आस-पास की धरती।
उधर हमसे अलग
हमारी आँखों के सामने ही
धरती में रमी
धरती-सी ही रही लड़कियाँ
हँसती थीं
रोती थीं
उगती थीं
हरियाती थीं
गाते हुए गीत मिल आती थीं पुरखिनियों से
बनाकर दुखों को रस्सी वे
अटकाती थीं उसे चाँद पर
और झूलती थीं झूला।
एक दिन गिरते थे औंधे मुँह
हम लड़के
और लोक लेती थीं लड़कियाँ
पके आम की तरह हमें।








