किसी की रचना के
शब्द व्यूहों में
अर्थ खोजने तक उलझता नहीं
सिर्फ़ भाव के प्रवाह में
बहता जाता हूँ अनायास
डूबकर देखता हूँ कहाँ थाह?
बुद्धि के हाथ तो
इधर-उधर सिर्फ़ काई बटोरते हैं
उनकी उपलब्धि शून्य, आह!
किंतु हृदय के असावधान चरण ये
उलझी हुई जीवन लताओं की
कोमल जड़ों में फँसते हैं
जितना ही छुड़ाता हूँ
फँसते ही जाते हैं
जीवन की शिराओं में।
इस तरह, बाहर भीतर भीगकर
आता हूँ सतह पर
और फिर भी कुछ मिले नहीं
तो भी होता हूँ कृतार्थ।








