अर्थ

आ. रा. देशपांडे अनिलआ. रा. देशपांडे अनिल

1 min read · 12.4K reads

किसी की रचना के

शब्द व्यूहों में

अर्थ खोजने तक उलझता नहीं

सिर्फ़ भाव के प्रवाह में

बहता जाता हूँ अनायास

डूबकर देखता हूँ कहाँ थाह?

बुद्धि के हाथ तो

इधर-उधर सिर्फ़ काई बटोरते हैं

उनकी उपलब्धि शून्य, आह!

किंतु हृदय के असावधान चरण ये

उलझी हुई जीवन लताओं की

कोमल जड़ों में फँसते हैं

जितना ही छुड़ाता हूँ

फँसते ही जाते हैं

जीवन की शिराओं में।

इस तरह, बाहर भीतर भीगकर

आता हूँ सतह पर

और फिर भी कुछ मिले नहीं

तो भी होता हूँ कृतार्थ।

आ. रा. देशपांडे अनिल
About the poet

आ. रा. देशपांडे अनिल

मराठी कविता में मुक्तछंद के प्रणेता के रूप में प्रतिष्ठित कवि। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।

View profile & all 3 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like