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हुस्न Sher
14 sher
तुम्हारी आँखों की तौहीन है ज़रा सोचोतुम्हारा चाहने वाला शराब पीता है

हुस्न के समझने को उम्र चाहिए जानाँदो घड़ी की चाहत में लड़कियाँ नहीं खुलतीं

नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिएपंखुड़ी इक गुलाब की सी है

'मीर' उन नीम-बाज़ आँखों मेंसारी मस्ती शराब की सी है

ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैंसाफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

कौन सी जा है जहाँ जल्वा-ए-माशूक़ नहींशौक़-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर

आस्तीं उस ने जो कुहनी तक चढ़ाई वक़्त-ए-सुब्हआ रही सारे बदन की बे-हिजाबी हाथ में

हसीं तो और हैं लेकिन कोई कहाँ तुझ साजो दिल जलाए बहुत फिर भी दिलरुबा ही लगे

तुम हुस्न की ख़ुद इक दुनिया हो शायद ये तुम्हें मालूम नहींमहफ़िल में तुम्हारे आने से हर चीज़ पे नूर आ जाता है

मुश्किल बहुत पड़ेगी बराबर की चोट हैआईना देखिएगा ज़रा देख-भाल के

आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गएसाहब को दिल न देने पे कितना ग़ुरूर था

शोख़ी-ए-हुस्न के नज़्ज़ारे की ताक़त है कहाँतिफ़्ल-ए-नादाँ हूँ मैं बिजली से दहल जाता हूँ

बहुत दिनों से मिरे साथ थी मगर कल शाममुझे पता चला वो कितनी ख़ूबसूरत है
