Couplets · शेर

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483 sher

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दोन जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए

बशीर बद्र

अब जुदाई के सफ़र को मिरे आसान करोतुम मुझे ख़्वाब में आ कर न परेशान करो

मुनव्वर राना

उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलोधड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है

Rahat Indori

वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिनउसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा

Sahir Ludhianvi

वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगामसअला फूल का है फूल किधर जाएगा

Parveen Shakir

ऐ मोहब्बत तिरे अंजाम पे रोना आयाजाने क्यूँ आज तिरे नाम पे रोना आया

Shakeel Badayuni

तुम को आता है प्यार पर ग़ुस्सामुझ को ग़ुस्से पे प्यार आता है

अमीर मीनाई

तुम भूल कर भी याद नहीं करते हो कभीहम तो तुम्हारी याद में सब कुछ भुला चुके

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकलेबहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

मिर्ज़ा ग़ालिब

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने हैजाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है

मीर तक़ी मीर

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहलेख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है

अल्लामा इक़बाल

ग़ज़ब किया तिरे वअ'दे पे ए'तिबार कियातमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया

दाग़ देहलवी

तुम मिरे पास होते हो गोयाजब कोई दूसरा नहीं होता

मोमिन ख़ाँ मोमिन

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनामवो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता

अकबर इलाहाबादी

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद हैहम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

हसरत मोहानी

ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजेइक आग का दरिया है और डूब के जाना है

जिगर मुरादाबादी

तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिनतू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था

मजाज़ लखनवी

बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल काजो चीरा तो इक क़तरा-ए-ख़ूँ न निकला

हैदर अली आतिश

ज़िंदगी है या कोई तूफ़ान हैहम तो इस जीने के हाथों मर चले

ख़्वाजा मीर दर्द

ढूँडोगे अगर मुल्कों मुल्कों मिलने के नहीं नायाब हैं हमजो याद न आए भूल के फिर ऐ हम-नफ़सो वो ख़्वाब हैं हम

शाद अज़ीमाबादी

ज़िंदगी जब्र है और जब्र के आसार नहींहाए इस क़ैद को ज़ंजीर भी दरकार नहीं

फ़ानी बदायुनी

ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीबमौत क्या है इन्हीं अज्ज़ा का परेशाँ होना

बृज नारायण चकबस्त

न जी भर के देखा न कुछ बात कीबड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की

बशीर बद्र

तुम्हारी आँखों की तौहीन है ज़रा सोचोतुम्हारा चाहने वाला शराब पीता है

मुनव्वर राना