Selected Quotes
Poetry & Stories
गोपिन के अँसुवान के नीर - तोष
गोपिन के अँसुवान के नीर पनारे बहे बहिकै भए नारे ।नारे भए ते भई नदियाँ नदियाँ नद ह्वै गए काटि कगारे ।
बिछुरे मग जाती सँघाती - तोष
बिछुरे मग जाती सँघाती मिली चख चाति कै धार सवाती मिली ।रसना जड़ की सरसाती मिली चित सूम को सोन की थाती मिली ।
सरकै अँग अँग अबै गति सी - तोष
सरकै अँग अँग अबै गति सी मिसि की रिसकी सिसकी भरती ।करि हूँ हूँ हहा हमसो हरिसो कै कका की सोँ मो करको धरती ।
तेरियै चित्र के काज हमै करि - तोष
तेरियै चित्र के काज हमै करि तोष सबै ब्रजराज दये हैँ ।पत्र बिचित्र बिचित्र बनाइ सिखाइ सबै बहु मोद मये हैँ ।
कैसे कहौँ कोक वे तो शोक ही मे रहेँ निशि - तोष
कैसे कहौँ कोक वे तो शोक ही मे रहेँ निशि ,ये तो शशिमुखी सदा आनँद सोँ हेरे हैँ ।
तोष: Quick Answers
Where can I read तोष's poetry?
Kavishala has 11 poems and stories by तोष, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by तोष
गोपिन के अँसुवान के नीर - तोष
गोपिन के अँसुवान के नीर पनारे बहे बहिकै भए नारे ।नारे भए ते भई नदियाँ नदियाँ नद ह्वै गए काटि कगारे ।
बिछुरे मग जाती सँघाती - तोष
बिछुरे मग जाती सँघाती मिली चख चाति कै धार सवाती मिली ।रसना जड़ की सरसाती मिली चित सूम को सोन की थाती मिली ।
सरकै अँग अँग अबै गति सी - तोष
सरकै अँग अँग अबै गति सी मिसि की रिसकी सिसकी भरती ।करि हूँ हूँ हहा हमसो हरिसो कै कका की सोँ मो करको धरती ।
तेरियै चित्र के काज हमै करि - तोष
तेरियै चित्र के काज हमै करि तोष सबै ब्रजराज दये हैँ ।पत्र बिचित्र बिचित्र बनाइ सिखाइ सबै बहु मोद मये हैँ ।
कैसे कहौँ कोक वे तो शोक ही मे रहेँ निशि - तोष
कैसे कहौँ कोक वे तो शोक ही मे रहेँ निशि ,ये तो शशिमुखी सदा आनँद सोँ हेरे हैँ ।
लाज बिलोकन देत नहीँ रतिराज - तोष
लाज बिलोकन देत नहीँ रतिराज बिलोकन ही की दई मति ।लाज कहै मिलिये न कहूँ रतिराज कहै हित सोँ मिलिये यति ।
आओ जिन आइबे को गहो जिन गहिबे को - तोष
आओ जिन आइबे को गहो जिन गहिबे को ,गहे रहिबे को छोड़ि छोड़िकै सुनावती ।
भूषन भूषित दूषन हीन प्रवीन - तोष
भूषन भूषित दूषन हीन प्रवीन महारस मैं छबि छाई.पूरी अनेक पदारथ तें जेहि में परमार्थ स्वारथ पाई.
एक कहै हँसि उधवजू! - तोष
एक कहै हँसि उधवजू!ब्रज की जुवती तजि चंद्रप्रभा सी.जाय कियो कहँ तोष प्रभू!इक प्रानपिया लहि कंस की दासी.
श्रीहरि की छबि देखिबे को - तोष
श्रीहरि की छबि देखिबे को अँखियाँ प्रति रोमहि में करि देतो.बैनन को सुनिबे हित स्रौन जितै तित सो करती करि हेतो.
तौ तन में रबि को प्रतिबिंब परे - तोष
तौ तन में रबि को प्रतिबिंब परे किरनै सो घनी सरसाती.भीतर हु रहि जात नहीं,अँखियाँ चकचौंधि ह्वै जाति हैं राती.
Selected Quotes by तोष (चुनिंदा उद्धरण)
बिछुरे मग जाती सँघाती मिली चख चाति कै धार सवाती मिली ।रसना जड़ की सरसाती मिली चित सूम को सोन की थाती मिली ।सरकै अँग अँग अबै गति सी मिसि की रिसकी सिसकी भरती ।करि हूँ हूँ हहा हमसो हरिसो कै कका की सोँ मो करको धरती ।तेरियै चित्र के काज हमै करि तोष सबै ब्रजराज दये हैँ ।पत्र बिचित्र बिचित्र बनाइ सिखाइ सबै बहु मोद मये हैँ ।आओ जिन आइबे को गहो जिन गहिबे को ,गहे रहिबे को छोड़ि छोड़िकै सुनावती ।एक कहै हँसि उधवजू!ब्रज की जुवती तजि चंद्रप्रभा सी.जाय कियो कहँ तोष प्रभू!इक प्रानपिया लहि कंस की दासी.श्रीहरि की छबि देखिबे को अँखियाँ प्रति रोमहि में करि देतो.बैनन को सुनिबे हित स्रौन जितै तित सो करती करि हेतो.Videos on तोष
Loading videos…
Books by तोष
Loading books…








