मछुए का गीत

Sumitranandan PantSumitranandan Pant20 May 1900 – 20 Dec 1977

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प्रेम की बंसी लगी न प्राण!

तू इस जीवन के पट भीतर
कौन छिपी मोहित निज छवि पर?
चंचल री नव यौवन के पर,
प्रखर प्रेम के बाण!
प्रेम की बंसी लगी न प्राण!

गेह लाड की लहरों का चल,
तज फेनिल ममता का अंचल,
अरी डूब उतरा मत प्रतिपल,
वृथा रूप का मान!
प्रेम की बंसी लगी न प्राण!

आए नव घन विविध वेश धर,
सुन री बहुमुख पावस के स्वर,
रूप वारी में लीन निरन्तर,
रह न सकेगी, मान!
प्रेम की बंसी लगी न प्राण!

नाँव द्वार आवेगी बाहर,
स्वर्ण जाल में उलझ मनोहर,
बचा कौन जग में लुक छिप कर
बिंधते सब अनजान!
प्रेम की बंसी लगी न प्राण!

घिर घिर होते मेघ निछावर,
झर झर सर में मिलते निर्झर,
लिए डोर वह अग जग की कर,
हरता तन मन प्राण!
प्रेम की बंसी लगी न प्राण!

Sumitranandan Pant
About the poet

Sumitranandan Pant

Sumitranandan Pant (20 May 1900 – 28 December 1977) was an Indian poet. He was one of the most celebrated 20th century poets of the Hindi language and was known for romanticism in his poems which were inspired by nature, people and beauty within. He is consid…

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