About सऊद उस्मानी
उपनाम : ''सऊद'' मूल नाम : सऊद उस्मानी जन्म : 06 Dec 1958 | लाहौर, पंजाब
Selected Quotes
About सऊद उस्मानी
उपनाम : ''सऊद''
मूल नाम : सऊद उस्मानी
जन्म : 06 Dec 1958 | लाहौर, पंजाब
सऊद उस्मानी: Quick Answers
Who is सऊद उस्मानी?
उपनाम : ''सऊद'' मूल नाम : सऊद उस्मानी जन्म : 06 Dec 1958 | लाहौर, पंजाब
When was सऊद उस्मानी born?
सऊद उस्मानी was born on 6 December 1958. Associated place: कराची, पाकिस्तान.
Where can I read सऊद उस्मानी's poetry?
Kavishala has 28 couplets (sher) by सऊद उस्मानी, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by सऊद उस्मानी
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Selected Quotes by सऊद उस्मानी (चुनिंदा उद्धरण)
हैरत से तकता है सहरा बारिश के नज़राने को कितनी दूर से आई है ये रेत से हाथ मिलाने कोपक्का रस्ता कच्ची सड़क और फिर पगडंडी जैसे कोई चलते चलते थक जाता हैमुझे ये सारे मसीहा अज़ीज़ हैं लेकिन ये कह रहे हैं कि मैं तुम से फ़ासला रक्खूँजान है तो जहान है दिल है तो आरज़ू भी है इशक़ भी हो रहेगा फिर जान अभी बचाइएमैं चाहता हूँ उसे और चाहने के सिवा मिरे लिए तो कोई और रास्ता भी नहींसूरज के उफ़ुक़ होते हैं मंज़िल नहीं होती सो ढलता रहा जलता रहा चलता रहा मैंCouplets (Sher) by सऊद उस्मानी
हैरत से तकता है सहरा बारिश के नज़राने को कितनी दूर से आई है ये रेत से हाथ मिलाने कोपक्का रस्ता कच्ची सड़क और फिर पगडंडी जैसे कोई चलते चलते थक जाता हैमुझे ये सारे मसीहा अज़ीज़ हैं लेकिन ये कह रहे हैं कि मैं तुम से फ़ासला रक्खूँजान है तो जहान है दिल है तो आरज़ू भी है इशक़ भी हो रहेगा फिर जान अभी बचाइएमैं चाहता हूँ उसे और चाहने के सिवा मिरे लिए तो कोई और रास्ता भी नहींसूरज के उफ़ुक़ होते हैं मंज़िल नहीं होती सो ढलता रहा जलता रहा चलता रहा मैंहर एक जिस्म में मौजूद हश्त-पा की तरह वबा का ख़ौफ़ है ख़ुद भी किसी वबा की तरहये जो मैं इतनी सहूलत से तुझे चाहता हूँ दोस्त इक उम्र में मिलती है ये आसानी भीख़्वाहिश है कि ख़ुद को भी कभी दूर से देखूँ मंज़र का नज़ारा करूँ मंज़र से निकल करतमाम उम्र यहाँ किस का इंतिज़ार हुआ है तमाम उम्र मिरा कौन इंतिज़ार करेगातेरी शिकस्त अस्ल में मेरी शिकस्त है तू मुझ से एक बार भी हारा तो मैं गयाबहुत दिनों में मिरे घर की ख़ामोशी टूटी ख़ुद अपने-आप से इक दिन कलाम मैं ने कियाये मेरी काग़ज़ी कश्ती है और ये मैं हूँ ख़बर नहीं कि समुंदर का फ़ैसला क्या हैउन से भी मेरी दोस्ती उन से भी रंजिशें सीने में एक हल्क़ा-ए-अहबाब और हैइतनी सियाह-रात में इतनी सी रौशनी ये चाँद वो नहीं मिरा महताब और हैसमझ लिया था तुझे दोस्त हम ने धोके में सो आज से तुझे बार-ए-दिगर समझते हैंये तो दुनिया भी नहीं है कि किनारा कर ले तू कहाँ जाएगा ऐ दिल के सताए हुए शख़्सवो चाहता था कि देखे मुझे बिखरते हुए सो उस का जश्न ब-सद-एहतिमाम मैं ने कियाकिसी अलाव का शोला भड़क के बोलता है सफ़र कठिन है मगर एक बार आख़िरी बारकुछ और भी दरकार था सब कुछ के अलावा क्या होगा जिसे ढूँडता था तेरे सिवा मैंहर शय से पलट रही हैं नज़रें मंज़र कोई जम नहीं रहा हैमिज़ाज-ए-दर्द को सब लफ़्ज़ भी क़ुबूल न थे किसी किसी को तिरे ग़म का इस्तिआरा कियाहर इक उफ़ुक़ पे मुसलसल तुलूअ होता हुआ मैं आफ़्ताब के मानिंद रहगुज़ार में थानज़र तो अपने मनाज़िर के रम्ज़ जानती है कि आँख कह नहीं सकती सुनी-सुनाई हुईऐसा है कि सिक्कों की तरह मुल्क-ए-सुख़न में जारी कोई इक याद पुरानी करें हम भीबरून-ए-ख़ाक फ़क़त चंद ठेकरे हैं मगर यहाँ से शहर मिलेंगे अगर खुदाई हुईआख़िर इक रोज़ उतरनी है लिबादों की तरह तन-ए-मल्बूस! ये पहनी हुई उर्यानी भीयकजाई से पल भर की ख़ुद-आराई भली थी शोले से निकल आए शरारे की तरह हम
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