अब और कहने कि ज़रुरत नहीं

Saadat Hasan MantoSaadat Hasan Manto11 May 1912

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ये दुनिया भी अजीब-ओ-ग़रीब है ख़ासकर आज का ज़माना क़ानून को जिस तरह फ़रेब दिया जाता है, इस के मुताल्लिक़ शायद आप को ज़्यादा इलम ना हो। आजकल क़ानून एक बे-मानी चीज़ बन कर रह गया है । उधर कोई नया क़ानून बनता है, उधर यार लोग उस का तोड़ सोच लेते हैं, इस के इलावा अपने बचाओ की कई सूरतों पैदा कर लेते हैं।

किसी अख़बार पर आफ़त आनी हो तो आया करे, उस का मालिक महफ़ूज़-ओ-मामून रहेगा, इस लिए कि प्रिंट लाईन में किसी कसाई या धोबी का नाम बहैसियत प्रिंटर पब्लिशर और ऐडीटर के दर्ज होगा । अगर अख़बार में कोई ऐसी तहरीर छप गई जिस पर गर्वनमैंट को एतराज़ हो तो असल मालिक के बजाय वो धोबी या कसाई गिरिफ़्त में आ जाएगा। उस को जुर्माना होगा या क़ैद। जुर्माना तो ज़ाहिर है अख़बार का मालिक अदा कर देगा, मगर क़ैद तो वो अदा नहीं कर सकता। लेकिन इन दो पार्टियों के दरमयान इस क़िस्म का मुआहिदा होता है कि अगर क़ैद हुई तो वो उस के घर इतने रुपय माहवार पहुंचा दिया करेगा। ऐसे मुआहिदे में ख़िलाफ़-वर्ज़ी बहुत कम होती है।

जो लोग नाजायज़ तौर पर शराब बेचते हैं, उन के पास दो तीन आदमी ऐसे ज़रूर मौजूद होते हैं जिन का सिर्फ़ ये काम है कि अगर पुलिस छापा मारे तो वो गिरफ़्तार हो जाएं और चंद माह की क़ैद काट कर वापस आ जाएं इस का मुआवज़ा उन को माक़ूल मिल जाता है।

छापा मारने वाले भी पहले ही से मुत्तला कर देते हैं कि हम आरहे हैं, तुम अपना इंतिज़ाम कर लो चुनांचे फ़ौरन इंतिज़ाम कर लिया जाता है, यानी मालिक ग़ाइब ग़ुल्ला हो जाता है और वो किराए के आदमी गिरफ़्तार हो जाते हैं ये भी एक क़िस्म की मुलाज़मत है लेकिन दुनिया में जितनी मुलाज़मतें हैं कुछ इसी क़िस्म की होती हैं।

मैं जब अमीन पहलवान से मिला तो वो तीन महीने की क़ैद काट कर वापस आया था। मैंने उस से पूछा : “अमीन! इस दफ़ा कैसे जेल में गए?”

अमीन मुस्कुराया: “अपने कारोबार के सिलसिले में”

“क्या कारोबार था?”

“जो रहा, वो है।”

“भई बताओ तो ”

“बताने की क्या ज़रूरत है आप अच्छी तरह जानते हैं मगर ख़्वाह-मख़्वाह मुझ से पूछ रहे हैं।”

मैंने थोड़े से तवक्कुफ़ के बाद इस से कहा “अमीन! तुम्हें आए दिन जेल में जाना क्या पसंद है?”

अमीन पहलवान मुस्कुराया: “जनाब पसंद और न पसंद का सवाल ही पैदा नहीं होता लोग मुझे पहलवान कहते हैं हालाँकि मैंने आज तक अखाड़े की शक्ल नहीं देखी अन-पढ़ हूँ कोई और हुनर भी मुझे नहीं आता बस, जेल जाना आता है। वहां मैं ख़ुश रहता हूँ मुझे कोई तकलीफ़ महसूस नहीं होती आप हर रोज़ दफ़्तर जाते हैं क्या वो जेल नहीं ”

मैं ला-जवाब होगया: “तुम ठीक कहते हो। अमीन लेकिन दफ़्तर जाने वालों का मुआमला दूसरा है लोग उन्हें बुरी निगाहों से नहीं देखते।”

“क्यों नहीं देखते! ज़िला कचहरी के जितने मुंशी और क्लर्क हैं उन्हें कौन अच्छी नज़र से देखता है रिश्वतें लेते हैं झूट बोलते हैं और प्रले दर्जे के मक्कार होते हैं।”

“मुझ में ऐसा कोई ऐब नहीं मैं अपनी रोज़ी बड़ी ईमानदारी से कमाता हूँ।”

मैंने इस से पूछा “किस तरह?”

उस ने जवाब दिया : “इस तरह कि अगर किसी का काम करता हूँ और क़ैद काटता हूँ जेल में मेहनत मशक़्क़त करता हूँ और बाद में उस शख़्स से जिस की ख़ातिर मैंने सज़ा भुगती थी, मुझे दो तीन सौ रुपया मिलता है तो ये मेरा मुआवज़ा है, इस पर किसी को क्या एतराज़ हो सकता है मैं रिश्वत तो नहीं लेता हलाल की कमाई खाता हूँ। लोग मुझे गुंडा समझते हैं बड़ा ख़तरनाक गुंडा लेकिन मैं आप को बताऊं कि मैंने आज तक किसी के थप्पड़ भी नहीं मारा। मेरी लाईन बिलकुल अलग है ”

उस की लाईन वाक़ई दूसरों से अलग थी मुझे हैरत थी कि तीन चार मर्तबा क़ैद काटने के बावजूद उस में कोई तबदीली वाक़्य नहीं हुई। वो बड़ा संजीदा मगर गंवार क़िस्म का आदमी था जिस को किसी की पर्वा नहीं थी। क़ैद काटने के बाद जब भी आता तो इस का वज़न कम अज़ कम दस पाऊंड ज़्यादा होता।

एक दिन मैंने उस से पूछा “अमीन क्या वहां का खाना तुम्हें रास आता है?”

उस ने अपने मख़सूस अंदाज़ में जवाब दिया : “खाना कैसा भी हो, उस को रास करना आदमी का अपना काम है मुझे दाल से नफ़रत थी, लेकिन जब पहली मर्तबा मुझे वहां कंकरों भरी दाल दी गई और रेत मिली रोटी तो मैंने कहा अमीन यार ये सब से अच्छा खाना है, खा, डिनर पेल और ख़ुदा का शुक्र बजा ला। चुनांचे मैं एक दो रोज़ ही में आदी होगया मशक़्क़त करता, खाना खाता और यूं महसूस करता जैसे मैंने गंजे के होटल से पेट भर कर खाना खाया है।”

मैंने एक दिन इस से पूछा : “तुम ने कभी किसी औरत से भी मुहब्बत की है?”

उस ने अपने दोनों कान पकड़े “ख़ुदा बचाए इस मुहब्बत से मुझे सिर्फ़ अपनी माँ से मुहब्बत है।”

मैंने उस से पूछा: “तुम्हारी माँ ज़िंदा है?”

“जी हाँ ख़ुदा के फ़ज़्ल-ओ-करम से बहुत बूढ़ी है लेकिन आप की दुआ से उस का साया मेरे सर पर देर तक क़ायम रहेगा और वो तो हर वक़्त मेरे लिए दुआएं मांगती रहती है कि ख़ुदा मुझे नेकी की हिदायत करे ”

मैंने उस से कहा : ख़ुदा तुम्हारी माँ को सलामत रखे! पर मैंने ये पूछा था कि तुम्हें किसी औरत से मुहब्बत हुई या नहीं देखो, झूट नहीं बोलना!”

अमीन पहलवान ने बड़े तेज़ लहजे में कहा : “मैंने अपनी ज़िंदगी में आज तक कभी झूट नहीं बोला मैंने किसी औरत से मुहब्बत नहीं की।”

मैंने पूछा : “क्यों”

उस ने जवाब दिया : “इस लिए कि मुझे उस से दिलचस्पी ही नहीं।”

मैं ख़ामोश हो रहा।

तीसरे रोज़ उस की माँ पर फ़ालिज गिरा और वो राहि-ए-मुल्क-ए-अदम हुई। अमीन पहलवान के पास एक पैसा भी नहीं था। वो सोगवार, मग़्मूम और दिल शिकस्ता बैठा था कि शहर के एक रईस की तरफ़ से उसे बुलावा आया। वो अपनी अज़ीज़ माँ की मय्यत छोड़कर उस के पास गया और उस से पूछा : “क्यों मियां साहब, आप ने मुझे क्यों बुलाया है?”

मियां साहिब ने कहा : “तुम्हें क्यों बुलाया जाता है एक ख़ास काम है”

अमीन ने जिस के दिल-ओ-दिमाग़ में अपनी माँ का कफ़न दफ़न तेर रहा था पूछा: “हुज़ूर ये ख़ास काम क्या है?”

मियां साहब ने सिगरेट सुलगाया : “ब्लैक मार्कीट का क़िस्सा है। मुझे मालूम हुआ है कि आज मेरे गोदाम पर छापा मारा जाएगा सो मैंने सोचा कि अमीन पहलवान बेहतरीन आदमी है जो उसे निमटा सकता है।”

अमीन ने बड़े मग़्मूम और ज़ख़्मी अंदाज़ में कहा: “आप फ़रमाईए, मैं आप की क्या ख़िदमत कर सकता हूँ?”

“भई, ख़िदमत विदमत की बात तुम मत करो बस सिर्फ़ इतनी सी बात है कि जब छापा पड़े तो गोदाम के मालक तुम होगे। गिरफ़्तार हो जाओगे। ज़्यादा से ज़्यादा जुर्माना पाँच हज़ार रुपय होगा और एक दो बरस की क़ैद!”

“मुझे क्या मिलेगा?”

“जब वहां से रहा हो कर आओगे तो मुआमला तै कर लिया जाएगा।”

अमीन ने मियां साहब से कहा : “हुज़ूर, बहुत दूर की बात है जुर्माना तो आप अदा कर देंगे, लेकिन क़ैद तो मुझे काटनी पड़ेगी। आप बाक़ायदा सौदा करें।”

मियां साहब मुस्कुराए : “तुम से आज तक मैंने कभी वाअदा ख़िलाफ़ी की है पिछली दफ़ा मैंने तुम से काम लिया और तुम को तीन महीने की क़ैद हुई, तो किया मैंने जेल ख़ाने में हर क़िस्म की सहूलत बहम न पहुंचाई। तुम ने बाहर आकर मुझ से कहा कि तुम्हें वहां कोई तकलीफ़ नहीं थी

अगर तुम कुछ अर्से के लिए जेल चले गए तो वहां तुम्हें हर आसाइश होगी।”

अमीन ने कहा : “जी ये सब दरुस्त है लेकिन।”

“लेकिन क्या?”

अमीन की आँखों में आँसू आगए : “मियां साहब! मेरी माँ मर गई है।”

“कब?”

“आज सुबह।”

मियां साहब ने अफ़सोस का इज़हार किया : “कफ़ना दफ़ना दिया होगा। अमीन की आँखों में से आँसू टप टप गिरने लगे मियां साहब अभी तो कुछ भी नहीं हो सका मेरे पास तो अफ़ीम खाने के लिए भी कुछ नहीं है।”

मियां साहब ने चंद लमहात हालात पर ग़ौर किया और अमीन से कहा : “तो ऐसा करो मेरा मतलब है कि तजहीज़-ओ-तकफ़ीन का बंद-ओ-बस्त में अभी किए देता हूँ तुम्हें किसी क़िस्म का तरद्दुद नहीं करना चाहिए तुम गोदाम पर जाओ और अपनी डियूटी सँभालो।”

अमीन ने अपनी मैली क़मीस की आसतीन से आँसू पोंछे “लेकिन मियां साहब मैं मैं अपनी माँ के जनाज़े को कंधा भी न दूं!”

मियां साहिब ने फ़लसफ़ियाना अंदाज़ में कहा “ये सब रस्मी चीज़ें हैं, मरहूमा को दफनाना है। सो ये काम बड़ी अच्छी तरह से हो जाएगा तुम्हें जनाज़े के साथ जाने की क्या ज़रूरत है। तुम्हारे साथ जाने से मरहूमा को क्या राहत पहुंचेगी वो तो बेचारी इस दुनिया से रुख़स्त हो चुकी है उस के जनाज़े के साथ कोई भी जाये क्या फ़र्क़ पड़ता है। असल में तुम लोग जाहिल हो मैं अगर मर जाऊं तो मुझे क्या मालूम है कि मेरे जनाज़े में किस किस अज़ीज़ और दोस्त ने शिरकत की थी। मुझे अगर जला भी दिया जाये तो क्या फ़र्क़ पड़ता है। मेरी लाश को चीलों और गिद्धों के हवाले कर दिया जाये तो मुझे उस की क्या ख़बर होगी। तुम ज़्यादा जज़्बाती न हो, दुनिया में सब से ज़रूरी चीज़ ये है कि अपनी ज़ात के मुतअल्लिक़ सोचा जाये मैं पूछता हूँ, तुम्हारी कमाई के ज़राए क्या हैं ”

अमीन सोचने लगा। चंद लम्हात अपनी बिसात के मुताबिक़ ग़ौर करने के बाद उस ने जवाब दिया “हुज़ूर! मेरी कमाई के ज़राए आप को मालूम हैं, मुझ से क्यों पूछते हैं।”

“मैंने इस लिए पूछा था कि तुम्हें मेरा काम करने में क्या हियल ओ हुज्जत है। मैं तुम्हारी माँ की तजहीज़-ओ-तकफ़ीन का अभी बन्द-ओ-बस्त किए देता हूँ, और जब तुम जेल से वापस आओगे तो।”

अमीन पहलवान ने बड़े बैंडे अंदाज़ में पूछा “तो आप मेरा भी बन्द-ओ-बस्त कर देंगे।”

मियां साहिब बौखला गए : “तुम कैसी बातें करते हो अमीन पहलवान!”

अमीन पहलवान ने ज़रा दुरुश्त लहजे में कहा : “अमीन पहलवान की ऐसी की तैसी। आप ये बताईए कि मुझे कितने रुपय मिलेंगे मैं एक हज़ार से कम नहीं लूंगा।”

“एक हज़ार तो बहुत ज़्यादा हैं।”

अमीन ने कहा : “ज़्यादा है या कम मैं कुछ नहीं जानता मैं जब क़ैद काट कर आऊँगा तो अपनी माँ की क़ब्र पुख़्ता बनाऊंगा, संग-ए-मरमर की वो मुझ से बहुत प्यार करती है।”

मियां साहब ने उस से कहा “अच्छा भई, एक हज़ार ही ले लेना।” अमीन ने मियां साहब से कहा : “तो लाईए इतने रुपय दीजिए कि मैं कफ़न दफ़न का इंतिज़ाम कर लूं इस के बाद में आप की ख़िदमत के लिए हाज़िर हो जाऊंगा।”

मियां साहब ने अपनी जेब से बटवा निकाला “लेकिन तुम्हारा क्या भरोसा है!”

अमीन को यूं महसूस हुआ जैसे उस को किसी ने माँ बहन की गाली दी है। “मियां साहब! आप मुझे बे-ईमान समझते हैं बे-ईमान आप हैं इस लिए कि अपने फ़ेअलों का बोझ मेरे सर पर डाल रहे हैं।”

मियां साहिब मौक़ा शनास थे। उन्हों ने समझा कि अमीन बिगड़ गया है, चुनांचे उन्हों ने फ़ौरन अपनी चर्ब-ज़बानी से राम करने की कोशिश की लेकिन अमीन पर कोई असर न हुआ।

जब वो घर पहुंचा तो देखा कि गुस्साल उसकी माँ को आख़िरी ग़ुस्ल दे चुके हैं। कफ़न भी पहनाया जा चुका है अमीन बहुत मुतहय्यर हुआ कि उस पर ये मेहरबानी किस ने की है मियां साहब ने लेकिन वो तो सौदा करना चाहते थे।

उस ने एक आदमी से जो ताबूत को सजाने के लिए फूल गूँध रहा था, पूछा “ये किस आदमी ने इतना एहतिमाम किया है?”

फूल वाले ने जवाब दिया : “हुज़ूर! आप की बीवी ने।”

अमीन चकरा गया वो अपने शदीद तअज्जुब का मुज़ाहिरा करता मगर ख़ामोश रहा। फूल वाले से सिर्फ़ इतना पूछा “कहाँ हैं वो ”

फूल वाले ने जवाब दिया : “जी अन्दर हैं आप का इंतिज़ार कर रही थीं ”

अमीन अंदर गया तो देखा कि एक नौ-जवान, ख़ूबसूरत लड़की उस की चारपाई पर बैठी है

अमीन ने इस से पूछा “आप कौन हैं यहां क्यों आई हैं”

उस लड़की ने जवाब दिया “मैं आप की बीवी हूँ यहां क्यों आई हूँ, ये आप का अजीब-ओ-ग़रीब सवाल है।”

अमीन ने उस से पूछा : “मेरी बीवी तो कोई भी नहीं। बताओ तुम कौन हो।”

लड़की मुस्कुराई : मैं मियां दीन की बेटी हूँ उन से जो आप की गुफ़्तुगू हुई, मैंने सब सुनी और और ”

अमीन ने कहा : “अब और कहने की ज़रूरत नहीं ”

Saadat Hasan Manto
About the poet

Saadat Hasan Manto

Saadat Hasan Manto (/mɑːn, -tɒ/; Urdu: سعادت حسن منٹو‎, pronounced [səˈaːd̪ət̪ ˈɦəsən ˈməɳʈoː]; 11 May 1912 – 18 January 1955) was a Pakistani writer, playwright and author born in Ludhiana, British India. Writing mainly in the Urdu language, he produced 22 c…

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चलो.... मलिका का बुत तोड़ें!<br />दूसरे ने कहा &mdash; नहीं यार.... कोतवाली को आग लगाएँ!<br />तीसरे ने कहा &mdash; और सारे बैंकों को भी!<br />चौथे ने उन को रोका &mdash; ठहरो.... इस से क्या फ़ायदा... चलो पुल पर उन लोगों को मारें।<br />मैंने उस को पहचान लिया। ये थैला कंजर था.... नाम मोहम्मद तुफ़ैल था, मगर थैला कंजर के नाम से मशहूर था। इस लिए कि एक तवाइफ़ के बतन से था। बड़ा आवारागर्द था। छोटी उम्र ही में उस को जोय और शराबनोशी की लत पड़ गई थी। इस की दो बहनें शमशाद और अलमास अपने वक़्त की हसीन-तरीन तवाइफ़ें थीं। शमशाद का गला बहुत अच्छा था। उस का मुजरा सुनने के लिए रईस बड़ी-बड़ी दूर से आते थे। दोनोंअपने भाई के करतूतों से बहुत नालाँ थीं। शहर में मशहूर था कि उन्होंने एक क़िस्म का उस को आक़ कर रखा है। फिर भी वो किसी न किसी हीले अपनी ज़रूरीयात के लिए उन से कुछ न कुछ वसूल कर ही लेता था। वैसे वो बहुत ख़ुशपोश रहता था। अच्छा खाता था, अच्छा पीता था। बड़ा नफ़ासत-पसन्द था। हँसोड़पन और लतीफ़ागोई मिज़ाज में कूट-कूट के भरी थी। मीरासियों और भाण्डों के सोक़यानापन से बहुत दूर रहता था।लम्बा क़द, भरे-भरे हाथ-पाँव, मज़बूत कसरती बदन। नाक नक़्शे का भी ख़ासा था।<br />पुरजोश लड़कों ने उस की बात न सुनी और मलिका के बुत की तरफ़ चलने लगे। उस ने फिर उनसे कहा &mdash; मैंने कहा मत ज़ाए करो अपना जोश। इधर आओ मेरे साथ.... चलो उन को मारें, जिन्होंने हमारे बेक़सूर आदमियों की जान ली है और उन्हें ज़ख़्मी किया है..... ख़ुदा की क़सम, हम सब मिलकर उनकी गर्दन मरोड़ सकते हैं... चलो!<br />कुछ लड़के रवाना हो चुके थे। बाक़ी रुक गए। थैला पुल की तरफ़ बढ़ा तो वे सब उस के पीछे चलने लगे। मैंने सोचा कि माँओं के ये लाल बेकार मौत के मुँह में जा रहे हैं। मैं फव्वारे के पास दुबका खड़ा था। वहीं से मैंने थैले को आवाज़ दी और कहा &mdash; मत जाओ यार... क्यों अपनी और उनकी जान के पीछे पड़े हो।<br />थैले ने यह सुनकर एक अजीब-सा क़हक़हा बुलन्द किया और मुझ से कहा &mdash; थैला सिर्फ़ ये बताने चला है कि वो गोलियों से डरने वाला नहीं। फिर वो अपने साथियों से मुख़ातिब हुआ &mdash; तुम डरते हो तो वापस जा सकते हो।<br />ऐसे मौक़ों पर बढ़े हुए क़दम उल्टे कैसे हो सकते हैं। और फिर वो भी उस वक़्त जब लीडर अपनी जान हथेली पर रख कर आगे-आगे जा रहा हो।थैले ने क़दम तेज़ किए तो उसके साथियों को भी करने पड़े।<br />हाल दरवाज़े से पुल का फ़ासला कुछ ज़्यादा नहीं.... होगा कोई साठ-सत्तर गज़ के क़रीब.... थैला सब से आगे-आगे था। जहाँ से पुल का दोरौया मुतवाज़ी जंगला शुरू होता है, वहाँ से पन्द्रह- बीस क़दम के फ़ासले पर दो घुड़सवार गोरे खड़े थे। थैला नारे लगाता जब बंगले के आग़ाज़ के पास पहुँचा तो फ़ायर हुआ, मैं समझा कि वो गिर पड़ा है... लेकिन देखा कि वो उसी तरह.... ज़िन्दा आगे बढ़ रहा है। उसके बाक़ी साथी डर के भाग उठे हैं। मुड़कर उसने पीछे देखा और चिल्लाया &mdash; भागो नहीं.... आओ!<br />उस का मुँह मेरी तरफ़ था कि एक और फ़ायर हुआ। पलट कर उसने गोरों की तरफ़ देखा और पीठ पर हाथ फेरा... भाईजान, नज़र तो मुझे कुछ नहीं आना चाहिए था, मगर मैंने देखा कि उस की सफ़ेद बोसकी की क़मीज़ पर लाल-लाल धब्बे थे.... वो और तेज़ी से बढ़ा, जैसे ज़ख़्मी शेर... एक और फ़ायर हुआ। वो लड़खड़ाया मगर एकदम क़दम मज़बूत करके वो घुड़सवार गोरे पर लपका और एकाएक न जाने क्या हुआ.... घोड़े की पीठ ख़ाली थी। गोरा ज़मीन पर था और थैला उस के ऊपर.... दूसरे गोरे ने, जो क़रीब था और पहले बौखला गया था, बिदकते हुए घोड़े को रोका और धड़ाधड़ फ़ायर शुरू कर दिए.... इस के बाद जो कुछ हुआ मुझे मालूम नहीं। मैं वहाँ फव्वारे के पास बेहोश हो कर गिर पड़ा।<br />भाईजान, जब मुझे होश आया तो में अपने घर में था। चन्द पहचान केआदमी मुझे वहाँ से उठा लाए थे। उन की ज़बानी मालूम हुआ कि पुल पर से गोलियाँ खाकर हुजूम उग्र हो गया था। नतीजा इसका ये हुआ कि मलिका के बुत को तोड़ने की कोशिश की गई। टाउन हाल और तीन बैंकों को आग लगी और पाँच या छह यूरोपियन मारे गए। ख़ूब लूट मची।<br />लूट-खसोट का अँग्रेज़ अफ़सरों को इतना ख़याल नहीं था। पाँच या छःयूरोपियन हलाक हुए थे। इस का बदला लेने के लिए ही जलियाँवाला बाग़ का ख़ूनीं हादिसा हुआ। डिप्टी कमिशनर बहादुर ने शहर की बागडोर जनरल डावर के सपुर्द कर दी। चुनांचे जनरल साहिब ने बारह अप्रैल को फ़ौजियों के साथ शहर के मुख़्तलिफ़ बाज़ारों में मार्च किया और दर्जनों बेगुनाह आदमी गिरफ़्तार किए। तेरह को जलियाँवाला बाग़ में जलसा हुआ। क़रीब-क़रीब पच्चीस हज़ार का मजमा था। शाम के क़रीब जनरल डावर मुसल्लह गोरों और सिखों के साथ वहाँ पहुँचा और निहत्थे आदमियों पर गोलियों की बारिश शुरू कर दी।<br />उस वक़्त तो किसी को इसका ठीक-ठीक अन्दाज़ा नहीं था कि कितने आदमी मारे गए हैं। लेकिन बाद में जब जाँच हुई तो पता चला कि एक हज़ार हलाक हुए हैं और तीन या चार हज़ार के क़रीब ज़ख़्मी.... लेकिन मैं थैले की बात कर रहा था...। भाईजान, आँखों देखी आप को बता चुका हूँ... बे-ऐब ज़ात ख़ुदा की है। मरहूम में चारों ऐब शरई थे। एक पेशा तवाइफ़ के बतन से था मगर जियाला था.... मैं अब यक़ीन के साथ कह सकता हूँ कि इस मलऊन गोरे की पहली गोली भी उस को लगी थी। आवाज़ सुन कर उस ने जब पलटकर अपने साथियों की तरफ़ देखा था, और उन्हें हौसला दिलाया था, तब जोश की हालत में उस को मालूम नहीं हुआ था कि उसकी छाती में गर्म-गर्म सीसा उतर चुका है। दूसरी गोली उस की पीठ में लगी। तीसरी फिर सीने में.... मैंने देखा नहीं, पर सुना है जब थैले की लाश गोरे से जुदा की गई तो उसके दोनों हाथ उस की गर्दन में इस बुरी तरह से पैवस्त थे कि अलहदा ही नहीं होते थे.... गोरा तब जहन्नुम में जा चुका था...।<br />दूसरे रोज़, जब थैले की लाश कफ़न-दफ़न के लिए उस के घर वालों के सुपुर्द की गई तो उसका बदन गोलियों से छलनी हो रहा था.... दूसरे गोरे ने तो अपना पूरा पिस्तौल ही उस पर ख़ाली कर दिया था... मेरा ख़याल है, उस वक़्त मरहूम की रूह क़फ़स-ए-उंसुरी से परवाज़ कर चुकी थी। इस शैतान के बच्चे ने सिर्फ़ उस के मुर्दा जिस्म पर चाँदमारी की थी।<br />कहते हैं, जब थैले की लाश मुहल्ले में पहुँची तो कुहराम मच गया। अपनी बिरादरी में वो इतना मक़बूल नहीं था, लेकिन उस की क़ीमा-क़ीमा लाश देखकर सब धाड़ें मार-मार कर रोने लगे। उस की बहनें शमशाद और अलमास तो बेहोश हो गईं। जब जनाज़ा उठा तो इन दोनों ने ऐसे बीन किए कि सुनने वाले लहू के आँसू रोते रहे।<br />भाईजान, मैंने कहीं पढ़ा था कि फ़्राँस के इन्क़लाब में पहली गोली वहाँ की एक टखयाई को लगी थी। मरहूम मुहम्मद तुफ़ैल एक तवाइफ़ का लड़का था। इन्क़लाब की इस जद्द-ओ-जहद में उसको जो पहली गोली लगी थी, दसवीं थी या पचासवीं। इस के मुताल्लिक़ किसी ने भी तहक़ीक़ नहीं की। शायद इसलिए कि सोसाइटी में इस ग़रीब का कोई रुतबा नहीं था। मैं तो समझता हूँ कि पंजाब के इस ख़ूनीं ग़ुसल में नहाने वालों की फ़हरिस्त में थैले कंजर का नाम-ओ-निशान तक भी नहीं होगा... और ये भी कोई पता नहीं कि ऐसी कोई फ़हरिस्त तैयार भी हुई थी।<br />सख़्त हंगामी दिन थे। फ़ौजी हुकूमत का दौर-दौरा था। वो देव, जिसे मार्शल लॉ कहते हैं, शहर के गली-गली कूचे-कूचे में डकारता फिरता था। बहुत अफ़रा-तफ़री के आलम में उस ग़रीब को जल्दी-जल्दी यूँ दफ़न किया गया, जैसे उसकी मौत उसके सोगवार अज़ीज़ों का एक संगीन जुर्म थी जिसके निशानात वो मिटा देना चाहते थे।<br />बस भाईजान, थैला मर गया। थैला दफ़ना दिया गया और.... और ये कहकर मेरा हमसफ़र पहली मर्तबा कुछ कहते-कहते रुका और ख़ामोश हो गया। ट्रेन दनदनाती हुई जा रही थी। पटरियों की खटाखट ने ये कहना शुरू कर दिया। थैला मर गया... थैला दफ़ना दिया गया.... थैला मर गया.... थैला दफ़ना दिया गया। इस मरने और दफ़नाने के दरमयान कोई फ़ासला नहीं था, जैसे वो इधर मरा और उधर दफ़ना दिया गया। और खट-खट के साथ इन अलफ़ाज़ की हम-आहंगी कुछ इस क़दर जज़्बात से आरी थी कि मुझे अपने दिमाग़ से इन दोनों को जुदा करना पड़ा। चुनाँचे मैंने अपने हम-सफ़र से कहा &mdash; आप कुछ और भी सुनाने वाले थे?<br />चौंक कर उस ने मेरी तरफ़ देखा और बोला &mdash; जी हाँ.... इस दास्तान का एक अफ़सोसनाक हिस्सा बाक़ी है।<br />मैंने पूछा &mdash; वह क्या?<br />उस ने कहना शुरू किया &mdash; मैं आप से अर्ज़ कर चुका हूँ कि थैले की दो बहनें थीं। शमशाद और अलमास। बहुत ख़ूबसूरत थीं। शमशाद लम्बी थी।पतले-पतले नक़्श। ग़लाफ़ी आँखें। ठुमरी बहुत ख़ूब गाती थी। सुना है, ख़ाँ साहब, फ़तह अली ख़ां से तालीम लेती रही थी। दूसरी अलमास थी। उस के गले में सुर नहीं था, लेकिन नाचने में अपना सानी नहीं रखती थी। मुजरा करती थी तो ऐसा लगता था कि इस का अंग-अंग बोल रहा है। हर भाव में एक घात होती थी.... आँखों में वो जादू था जो हर एक के सर पर चढ़ के बोलता था।<br />मेरे हमसफ़र ने तारीफ़-ओ-तौसीफ में कुछ ज़रूरत से ज़्यादा वक़्त लिया। मगर मैंने टोकना मुनासिब न समझा। थोड़ी देर के बाद वो ख़ुद इस लम्बे चक्कर से निकला और दास्तान के अफ़सोनाक हिस्से की तरफ़ आया &mdash; क़िस्सा यह है, भाईजान, कि इन आफ़त की परकाला दो बहनों के हुस्न-ओ-जमाल का ज़िक्र किसी ख़ुशामदी ने फ़ौजी अफ़सरों से कर दिया.... बल्वे में एक मेम.... क्या नाम था उस चुड़ैल का?मिस....मिस शेरवुड मारी गई थी.... तय ये हुआ कि उन को बुलवाया जाए और.... और.... जी भर के इंन्तकाम लिया जाए.... आप समझ गए ना, भाई जान?<br />मैंने कहा &mdash; जी हाँ!<br />मेरे हमसफ़र ने एक आह भरी &mdash; ऐसे नाज़ुक मामलों में तवाइफ़ें और कस्बियाँ भी अपनी माँएँ-बहनें होती हैं.... मगर भाईजान ये मुल्क अपनी इज़्ज़त-ओ-नामूस को, मेरा ख़्याल है, पहचानता ही नहीं। जब ऊपर से इलाक़े के थानेदार को आर्डर मिला तो वो फ़ौरन तैयार हो गया। चुनांचे वो ख़ुद शमशाद और अलमास के मकान पर गया और कहा कि साहब लोगों ने याद किया है। वो तुम्हारा मुजरा सुनना चाहते हैं... भाई की क़ब्र की मिट्टी भी अभी तक ख़ुशक नहीं हुई थी। अल्लाह को प्यारा हुए उस ग़रीब को सिर्फ़ दो दिन हुए थे कि ये हाज़िरी का हुक्म सादिर हुआ कि आओ हमारे हुज़ूर नाचो.... अज़िय्यत का इससे बढ़ कर पुर-अज़िय्यत तरीक़ा क्या हो सकता है....? मुस्तबइद तम्सख़ुर की ऐसी मिसाल, मेरा ख़्याल है, शायद ही कोई और मिल सके.... क्या हुक्म देने वालों को इतना ख़याल भी न आया कि तवाइफ़ भी ग़ैरतमन्द होती है? ....हो सकती है... क्यों नहीं हो सकती? उस ने अपने आप से सवाल किया, लेकिन मुख़ातिब वो मुझसे ही था।<br />मैंने कहा &mdash; हाँ, हो सकती है!<br />&mdash; जी हाँ ....थैला आख़िर इन का भाई था। उस ने किसी की मार ख़ाने की लड़ाई-भिड़ाई में अपनी जान नहीं दी थी। वो शराब पी कर दंगा-फ़साद करते हुए हलाक नहीं हुआ था। उसने वतन की राह में बड़े बहादुराना तरीक़े पर शहादत का जाम पिया था। वो एक तवाइफ़ के बतन से था। लेकिन वो तवाइफ़ माँ थी और शमशाद और अलमास उसी की बेटियां थीं और ये थैले की बहनें थीं.... तवाइफ़ें बाद में थीं.... और वो थैले की लाश देख कर बेहोश हो गई थीं। जब उस का जनाज़ा उठा था तो उन्होंने ऐसे बीन किए थे कि सुन कर आदमी लहू रोता था....।<br />मैंने पूछा &mdash; वो गईं?<br />मेरे हमसफ़र ने इस का जवाब थोड़े वक़फ़े के बाद उदासी से दिया &mdash; जी हाँ... जी हाँ गईं... ख़ूब सज बनकर। एक दम उसकी उदासी गहरी हो गई &mdash; सोलह सिंगार करके अपने बुलाने वालों के पास गईं.... कहते हैं कि ख़ूब महफ़िल जमी.... दोनों बहनों ने अपने जौहर दिखाए.... ज़रक़-बरक़ पिशवाज़ों में मलबूस वो कोह-ए-क़ाफ़ की परियाँ मालूम होती थीं....शराब के दौर चलते रहे और वो नाचती-गाती रहीं... ये दोनों दौर चलते रहे .... और कहते हैं कि.... रात के दो बजे एक बड़े अफ़सर के इशारे पर महफ़िल बरख़ास्त हुई...।<br />मेरा हमसफ़र उठ खड़ा हुआ और बाहर भागते हुए दरख़्तों को देखने लगा।पहियों और पटरियों की आहनी गड़गड़ाहट की ताल पर उसके आख़िरी दो लफ़्ज़ नाचने लगे &mdash; बरख़ास्त हुई... बरख़ास्त हुई।<br />मैंने अपने दिमाग़ में उन्हें, आहनी गड़गड़ाहट से नोच कर अलहदा करते हुए उससे पूछा &mdash; फिर क्या हुआ?<br />भागते हुए दरख़्तों और खम्भों से नज़रें हटा कर उस ने बड़े मज़बूत लहजे में कहा &mdash; उन्होंने अपनी ज़रक़-बरक़ पिशवाज़ें नोच डालें और अलिफ़ नंगी हो गईं और कहने लगीं.... लो देख लो... हम थैले की बहनें हैं.... उस शहीद की, जिसके ख़ूबसूरत जिस्म को तुमने सिर्फ़ इसलिए अपनी गोलियों से छलनी-छलनी किया था कि उसमें वतन से मोहब्बत करने वाली रूह थी... हम उसी की ख़ूबसूरत बहनें हैं... आओ, अपनी शहवत के गर्म-गर्म लोहे से हमारा ख़ुशबूओं में बसा हुआ जिस्म दागदार करो.... मगर ऐसा करने से पहले सिर्फ़ हमें एक बार अपने मुँह पर थूक लेने दो...।<br />यह कहकर वो ख़ामोश हो गया। कुछ इस तरह कि और नहीं बोलेगा। मैंने फ़ौरन ही पूछा &mdash; फिर क्या हुआ?<br />उस की आँखों में आँसू डबडबा आए &mdash; उनको.... उनको गोली से उड़ा दिया गया।<br />मैंने कुछ न कहा। गाड़ी आहिस्ता होकर स्टेशन पर रुकी तो उस ने क़ुली बुलाकर अपना अस्बाब उठवाया। जब जाने लगा तो मैं ने उस से कहा &mdash; आपने जो दास्तान सुनाई, इस का अंजाम मुझे आप का ख़ुदसाख़्ता मालूम होता है।<br />एकदम चौंककर उसने मेरी तरफ़ देखा &mdash; ये आप ने कैसे जाना?<br />मैंने कहा &mdash; आप के लहजे में एक नाक़ाबिल-ए-बयान कर्ब था।<br />मेरे हमसफ़र ने अपने हलक़ की तल्ख़ी थूक के साथ निगलते हुए कहा &mdash; जी हाँ... उन हराम..., वो गाली देते-देते रुक गया &mdash; उन्होंने अपने शहीद भाई के नाम पर बट्टा लगा दिया।<br />यह कहकर वो प्लेटफार्म पर उतर गया।<br />(11-12 अक्तूबर1951 ईस्वी)</p>

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  3. अक्ल दाढ़

    आप मुँह सुजाये क्यों बैठे हैं?भई दाँत में दर्द हो रहा है तुम तो ख़्वाह-मख़्वाह ।

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  4. अनार कली

    नाम उस का सलीम था मगर उस के यार दोस्त उसे शहज़ादा सलीम कहते थे। ग़ालिबन इस लिए कि उस के ख़द-ओ-ख़ाल मुग़लई थे ख़ूबसूरत था। चाल ढाल से राऊनत टपकती थी।उस का बाप पीडब्ल्यू डी के दफ़्तर में मुलाज़िम था। तनख़्वाह ज़्यादा से ज़्यादा सौ रुपय होगी मगर बड़े ठाट से रहता ज़ाहिर है कि रिश्वत खाता था यही वजह है कि सलीम अच्छे से अच्छा कपड़ा पहनता जेब ख़र्च भी उस को काफ़ी मिलता इस लिए कि वो अपने वालदैन का इकलौता लड़का था।

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  5. अंजाम-ए-नजीर

    बटवारे के बाद जब फ़िर्का-वाराना फ़सादात शिद्दत इख़्तियार कर गए और जगह जगह हिंदूओं और मुस्लमानों के ख़ून से ज़मीन रंगी जाने लगी तो नसीम अख़तर जो दिल्ली की नौ-ख़ेज़ तवाइफ़ थी अपनी बूढ़ी माँ से कहा चलो माँ यहां से चलेंबूढ़ी बाइका ने अपने पोपले मुँह में पानदान से छालिया के बारीक बारीक टुकड़े डालते हुए उस से पूछा कहाँ जाऐंगे बेटा

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