थकन को ओढ़ के बिस्तर में जा के लेट गए

मुनव्वर रानामुनव्वर राना26 Sept 1952 – 14 Jan 2024

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थकन को ओढ़ के बिस्तर में जा के लेट गए

हम अपनी क़ब्र-ए-मुक़र्रर में जा के लेट गए

तमाम उम्र हम इक दूसरे से लड़ते रहे

मगर मरे तो बराबर में जा के लेट गए

हमारी तिश्ना-नसीबी का हाल मत पूछो

वो प्यास थी कि समुंदर में जा के लेट गए

न जाने कैसी थकन थी कभी नहीं उतरी

चले जो घर से तो दफ़्तर में जा के लेट गए

ये बेवक़ूफ़ उन्हें मौत से डराते हैं

जो ख़ुद ही साया-ए-ख़ंजर में जा के लेट गए

तमाम उम्र जो निकले न थे हवेली से

वो एक गुम्बद-ए-बे-दर में जा के लेट गए

सजाए फिरते थे झूटी अना जो चेहरों पर

वो लोग क़स्र-ए-सिकंदर में जा के लेट गए

सज़ा हमारी भी काटी है बाल-बच्चों ने

कि हम उदास हुए घर में जा के लेट गए

मुनव्वर राना
About the poet

मुनव्वर राना

मुनव्वर राना (जन्म: 26 नवंबर 1952,मृत्यु: 14 जनवरी 2024, रायबरेली, उत्तर प्रदेश) उर्दू भाषा के साहित्यकार हैं। इनके द्वारा रचित एक कविता शाहदाबा के लिये उन्हें सन् 2014 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।[1] वे लखनऊ में रहते हैं। भारत-पाकिस्तान…

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