मिर्ज़ा ग़ालिब की लोकप्रिय शायरी

Mirza GhalibMirza Ghalib27 Dec 1797 – 15 Feb 1869

1 min read · 22.5K reads

हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है


हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ
रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन

Mirza Ghalib
About the poet

Mirza Ghalib

Ghalib, born Mirza Asadullah Baig Khan, was a prominent Urdu and Persian poet during the last years of the Mughal Empire. He used his pen-names of Ghalib and Asad. His honorific was Dabir-ul-Mulk, Najm-ud-Daula. Most notably, he wrote in both Urdu and Persian…

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