अपने दिल को दोनों आलम से उठा सकता हूँ मैं

Majaz LakhnawiMajaz Lakhnawi19 Oct 1911 – 5 Dec 1955

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अपने दिल को दोनों आलम से उठा सकता हूँ मैं
क्या समझती हो कि तुमको भी भुला सकता हूँ मैं

कौन तुमसे छीन सकता है मुझे क्या वहम है
खुद जुलेखा से भी तो दामन बचा सकता हूँ मैं

दिल मैं तुम पैदा करो पहले मेरी सी जुर्रतें
और फिर देखो कि तुमको क्या बना सकता हूँ मैं

दफ़न कर सकता हूँ सीने मैं तुम्हारे राज़ को
और तुम चाहो तो अफसाना बना सकता हूँ मैं

तुम समझती हो कि हैं परदे बोहत से दरमियाँ
मैं यह कहता हूँ कि हर पर्दा उठा सकता हूँ मैं

तुम कि बन सकती हो हर महफ़िल मैं फिरदौस-ए-नज़र
मुझ को यह दावा कि हर महफ़िल पे छा सकता हूँ मैं

आओ मिल कर इन्किलाब ताज़ा पैदा करें
दहर पर इस तरह छा जाएं कि सब देखा करें

Majaz Lakhnawi
About the poet

Majaz Lakhnawi

Asrar ul Haq Majaz Urdu: اسرارُالحق مجاز‎ commonly known as Majaz Lakhnawi Urdu: مجاز لکھنَوی ‎ (19 October 1911 – 5 December 1955) was an Indian Urdu poet. He was known for his romantic and revolutionary poetry. He composed ghazals and nazms in Urdu. He was…

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