About इब्न-ए-इंशा
उपनाम : 'इंशा' मूल नाम : शेर मुहम्मद ख़ान जन्म : 15 Jun 1927 | फिल्लौर, पंजाब निधन : 11 Jan 1978 | इंग्लैंड
Selected Quotes
About इब्न-ए-इंशा
उपनाम : 'इंशा'
मूल नाम : शेर मुहम्मद ख़ान
जन्म : 15 Jun 1927 | फिल्लौर, पंजाब
निधन : 11 Jan 1978 | इंग्लैंड
इब्न-ए-इंशा: Quick Answers
Who is इब्न-ए-इंशा?
उपनाम : 'इंशा' मूल नाम : शेर मुहम्मद ख़ान जन्म : 15 Jun 1927 | फिल्लौर, पंजाब निधन : 11 Jan 1978 | इंग्लैंड
When was इब्न-ए-इंशा born?
इब्न-ए-इंशा was born on 15 June 1927. Associated place: कराची, पाकिस्तान.
When did इब्न-ए-इंशा die?
इब्न-ए-इंशा passed away on 11 January 1978.
Where can I read इब्न-ए-इंशा's poetry?
Kavishala has 30 couplets (sher) by इब्न-ए-इंशा, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by इब्न-ए-इंशा
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Selected Quotes by इब्न-ए-इंशा (चुनिंदा उद्धरण)
इक साल गया इक साल नया है आने को पर वक़्त का अब भी होश नहीं दीवाने कोकब लौटा है बहता पानी बिछड़ा साजन रूठा दोस्त हम ने उस को अपना जाना जब तक हाथ में दामाँ थारात आ कर गुज़र भी जाती है इक हमारी सहर नहीं होतीवो रातें चाँद के साथ गईं वो बातें चाँद के साथ गईं अब सुख के सपने क्या देखें जब दुख का सूरज सर पर होअपनी ज़बाँ से कुछ न कहेंगे चुप ही रहेंगे आशिक़ लोग तुम से तो इतना हो सकता है पूछो हाल बेचारों का'इंशा'-जी उठो अब कूच करो इस शहर में जी को लगाना क्या वहशी को सुकूँ से क्या मतलब जोगी का नगर में ठिकाना क्याCouplets (Sher) by इब्न-ए-इंशा
इक साल गया इक साल नया है आने को पर वक़्त का अब भी होश नहीं दीवाने कोकब लौटा है बहता पानी बिछड़ा साजन रूठा दोस्त हम ने उस को अपना जाना जब तक हाथ में दामाँ थारात आ कर गुज़र भी जाती है इक हमारी सहर नहीं होतीवो रातें चाँद के साथ गईं वो बातें चाँद के साथ गईं अब सुख के सपने क्या देखें जब दुख का सूरज सर पर होअपनी ज़बाँ से कुछ न कहेंगे चुप ही रहेंगे आशिक़ लोग तुम से तो इतना हो सकता है पूछो हाल बेचारों का'इंशा'-जी उठो अब कूच करो इस शहर में जी को लगाना क्या वहशी को सुकूँ से क्या मतलब जोगी का नगर में ठिकाना क्यादिल हिज्र के दर्द से बोझल है अब आन मिलो तो बेहतर हो इस बात से हम को क्या मतलब ये कैसे हो ये क्यूँकर होहम भूल सके हैं न तुझे भूल सकेंगे तू याद रहेगा हमें हाँ याद रहेगाहुस्न सब को ख़ुदा नहीं देता हर किसी की नज़र नहीं होतीहम किसी दर पे न ठिटके न कहीं दस्तक दी सैकड़ों दर थे मिरी जाँ तिरे दर से पहलेगर्म आँसू और ठंडी आहें मन में क्या क्या मौसम हैं इस बग़िया के भेद न खोलो सैर करो ख़ामोश रहोकूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएँ मगर जंगल तिरे पर्बत तिरे बस्ती तिरी सहरा तिराअहल-ए-वफ़ा से तर्क-ए-तअल्लुक़ कर लो पर इक बात कहें कल तुम इन को याद करोगे कल तुम इन्हें पुकारोगेएक से एक जुनूँ का मारा इस बस्ती में रहता है एक हमीं हुशियार थे यारो एक हमीं बद-नाम हुएअपने हमराह जो आते हो इधर से पहले दश्त पड़ता है मियाँ इश्क़ में घर से पहलेइस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटीं महफ़िलें हर शख़्स तेरा नाम ले हर शख़्स दीवाना तिराबेकल बेकल रहते हो पर महफ़िल के आदाब के साथ आँख चुरा कर देख भी लेते भोले भी बन जाते होकुछ कहने का वक़्त नहीं ये कुछ न कहो ख़ामोश रहो ऐ लोगो ख़ामोश रहो हाँ ऐ लोगो ख़ामोश रहो'मीर' से बैअत की है तो 'इंशा' मीर की बैअत भी है ज़रूर शाम को रो रो सुब्ह करो अब सुब्ह को रो रो शाम करोआन के इस बीमार को देखे तुझ को भी तौफ़ीक़ हुई लब पर उस के नाम था तेरा जब भी दर्द शदीद हुआयूँही तो नहीं दश्त में पहुँचे यूँही तो नहीं जोग लिया बस्ती बस्ती काँटे देखे जंगल जंगल फूल मियाँएक दिन देखने को आ जाते ये हवस उम्र भर नहीं होतीवहशत-ए-दिल के ख़रीदार भी नापैद हुए कौन अब इश्क़ के बाज़ार में खोलेगा दुकाँदीदा ओ दिल ने दर्द की अपने बात भी की तो किस से की वो तो दर्द का बानी ठहरा वो क्या दर्द बटाएगासुन तो लिया किसी नार की ख़ातिर काटा कोह निकाली नहर एक ज़रा से क़िस्से को अब देते क्यूँ हो तूल मियाँबे तेरे क्या वहशत हम को तुझ बिन कैसा सब्र ओ सुकूँ तू ही अपना शहर है जानी तू ही अपना सहरा हैजब शहर के लोग न रस्ता दें क्यूँ बन में न जा बिसराम करे दीवानों की सी न बात करे तो और करे दीवाना क्याहम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन मेंहक़ अच्छा पर उस के लिए कोई और मिरे तो और अच्छा तुम भी कोई मंसूर हो जो सूली पे चढ़ो ख़ामोश रहोजल्वा-नुमाई बेपरवाई हाँ यही रीत जहाँ की है कब कोई लड़की मन का दरीचा खोल के बाहर झाँकी है
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