वसंत में ताज़े-खिले इस अनाम
फूल की हिम्मत तो देखो—
कि
यौवन में, पत्थरों—-
(खंडहर के रोड़े रहे!)
—के बीच में पड़े हुए,
हसमुख के हसमुख को चीर कर,
चौबीस वर्षों से पनपते
रक्त-मज्जा-मास-अस्थि में—
सुगंधित हास्य सींचकर,
मुग्ध पंखुड़ियों से हवा में खिलखिलाकर
कह उठा—
कि
चल हँसें इस वसंत में!








