आदि था
कि युगादि था
कौन जाने
कब था
और क्या था?
इतना-भर
कहते हैं
कि मैं
एक सेल का
जीव था
जो अभी-अभी
सजीव हुआ अजीब तरह
एक से टूटकर
दो हो गया
मैं प्रतिदिन
चाहता रहा
और चाहत भी
दो से एक होने की रही
लाखों साल
युग अनेक
घूमकर
लाख चौरासी
जन-जन बदलता
मैं मनुष्य योनि में
आ बैठा हूँ
चतुर बुद्धि
मानस की
इस जाति ने
मेरी इस चाहत
और चाह का नाम
बताया
बनाया कामदेव
मेरा यह
मामूली-सा श्रम
अपने आधे हिस्से को पा जाने का
मेरा तुम्हारा था मिलना
क्षण भंगुर है
कौन करेगा
अलग हमें? इसीलिए क्रोधित हूँ
अधिकार और क्रोध
दोनों साथ आए
जो देखता था तुम्हारी ओर
क्रोधी हो उस पर झपटा मैं
उसी क्षण में से
तेरा-मेरा साँझा रूप
फूटा, जन्मा
उसी संयुक्त रूप को
ले जाए न कोई
खा न ले कोई फिर
उसी के लिए मोह जागा
जो हमारी एकता का प्रतीक
भविष्य एक जो निशान
कहता रहे
यूँ एक लोभ-सा
उसकी ख़ातिर दुनिया सारी जीत सकूँ
जीने योग्य कर दूँ उसे
'मैं' का संकल्प
इससे जागता
चतुर-बुद्धि, लोभ, मोह, अहंकार
यदि न होता, तुम न होती
यह संसार न होता
एक से दो होने तक
सारा खेल यह
इसके बिना भी
हो सकता था कोई?








