मौत की सम्त जान चलती रही

Fehmi Badayuniफ़हीम बँदायुनी4 Jan 1952

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मौत की सम्त जान चलती रही
ज़िंदगी की दुकान चलती रही

सारे किरदार सो गए थक कर
बस तिरी दास्तान चलती रही

मैं लरज़ता रहा हदफ़ बन कर
मश्क़-ए-तीर-ओ-कमान चलती रही

उल्टी सीधी चराग़ सुनते रहे
और हवा की ज़बान चलती रही

दो ही मौसम थे धूप या बारिश
छतरियों की दुकान चलती रही

जिस्म लम्बे थे चादरें छोटी
रात भर खींच-तान चलती रही

पर निकलते रहे बिखरते रहे
ऊँची नीची उड़ान चलती रही

Fehmi Badayuni
About the poet

Fehmi Badayuni फ़हीम बँदायुनी

In the twenty-first century, Fahmi Badauni Sahib is preparing the same land on which new crops of Ghazal will grow. Born on 4 January 1952 in Bisauli town of Badaun district. Necessity brought him to the job of an accountant at a young age. When luck turned h…

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