छंद

Chand BardaiChand Bardai30 Sept 1149

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१.

'चन्द' प्यारो मितु, कहो क्यों पाईऐ
करहु सेवा तिंह नित, नहिं चितह भुलाईऐ
गुनि जन कहत पुकार, भलो या जीवनो
हो बिन प्रीतम केह काम, अमृत को पीवनो।

२.

अंतरि बाहरि 'चन्द' एक सा होईऐ
मोती पाथर एक, ठउर नहिं पाईऐ
हिये खोटु तन पहर, लिबास दिखाईऐ
हो परगटु होइ निदान, अंत पछुताईऐ।

३.

जब ते लागो नेहु, 'चन्द' बदनाम है
आंसू नैन चुचात, आठु ही जाम है
जगत माहिं जे बुधिवान सभ कहत है
हो नेही सकले संग नाम ते रहत है।

४.

सभ गुण जो प्रवीण, 'चन्द' गुनवंतु है
बिन गुण सब अधीन, सु मूरखु जंतु है
सभहु नरन मैं ताकु, होइ जो या समैं
हो हुनरमन्द जो होइ, समो सुख सिउं रमैं।

५.

'चन्द' गरज़ बिन को संसार न देखीऐ
बेगरज़ी अमोल रत्न चख पेखीऐ
रंक राउ जो दीसत, है संसार मैं
हो नाहिं गरज़ बिन कोऊ, कीयो विचार मैं।

६.

'चन्द' राग धुनि दूती प्रेमी की कहैं
नेमी धुन सुन थकत, अचंभौ होइ रहै
बजत प्रेम धुनि तार, अक्ल कउ लूट है
हो श्रवण मध्य होइ पैठत, कबहू न छूट है।

७.

'चन्द' प्रेम की बात, न काहूं पै कहो
अतलस खर पहराय, कउन खूबी चहों
बुधिवान तिंह जान, भेद निज राखई
हो देवै सीस उतारि, सिररु नहिं भाखई।

८.

'चन्द' माल अर मुल्क, जाहिं प्रभु दीयो है
अपनो दीयो बहुत, ताहिं प्रभु लीयो है
रोस करत अज्ञानी, मन का अंध है
हो अमर नाम गोबिन्द, अवरु सब धन्द है।

९.

'चन्द' जगत मो काम सभन को कीजीऐ
कैसे अम्बर बोइ, खसन सिउं लीजीऐ
सोउ मर्द जु करै मर्द के काम कउ
हो तन मन धन सब सउपे, अपने राम कउ।

१०.

'चन्द' प्यारनि संगि प्यार बढाईऐ
सदा होत आनन्द राम गुण गाईऐ
ऐसो सुख दुनिया मैं, अवर न पेखीऐ
हो मिलि प्यारन कै संगि, रंग जो देखीऐ।

११.

'चन्द' नसीहत सुनीऐ, करनैहार की
दीन होइ ख़ुश राखो, खातर यार की
मारत पाय कुहाड़ा, सख्ती जो करै
हो नरमायी की बात, सभन तन संचरै।

१२.

'चन्द' कहत है काम चेष्टा अति बुरी
शहत दिखायी देत, हलाहल की छुरी
जिंह नर अंतरि काम चेष्टा अति घनी
हो हुइ है अंत खुआरु, बडो जो होइ धनी।

१३.

'चन्द' प्यारे मिलत होत आनन्द जी
सभ काहूं को मीठो, शर्बत कन्द जी
सदा प्यारे संगि, विछोड़ा नाहिं जिस
हो मिले मीत सिउं मीत, एह सुख कहे किस।

१४.

'चन्द' कहत है ठउर, नहीं है चित जिंह
निस दिन आठहु जाम, भ्रमत है चित जिंह
जो कछु साहब भावै, सोई करत है
हो लाख करोड़ी जत्न, किए नहीं टरत है।

Chand Bardai
About the poet

Chand Bardai

Chand Bardai was an Indian poet, who composed Prithviraj Raso, an epic poem in Brajbhasa about the life of the Chahamana king Prithviraj Chauhan. The poem presents him as a court poet of Prithviraj.

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