भाषा

बसंत त्रिपाठीबसंत त्रिपाठी25 Sept 1972

1 min read · 12.4K reads

इस देश में

जो रूसी सीख लेता है

रूस में बस जाने की सोचता है

जो जर्मन सीखता है जर्मनी में बस जाने की फ़िराक़ में होता है

जापानी सीखने वाले के मन में

तोक्यो उछाल मारता है

फ़्रेंच सीखने वाला

फ़्रांस की दूरियाँ गुनता है

और यहाँ रहने पर अफ़सोस जताता है

जो अँग्रेज़ी जान लेता है

वह तो मानता ही है

कि दुनिया के सारे बड़े शहरों के रास्ते

खुल गए हैं उसके वास्ते

लेकिन जो हिंदी जानता है केवल या मराठी या गुजराती या पंजाबी या तेलुगु

वह अपनी भाषा में घुलता रहता है

अपने ही राज्य में बंदी

भोजपुरी और छत्तीसगढ़ी जानने वाले

नई राजनीति में अपनी जगह ढूँढ़ते हैं

अब जो सिर्फ़ मुंडा या उड़ाँव जानते हैं

कुड़ुख या गोंडी या झाड़ी बोली

उनके घरों को कभी भी रौंदा जा सकता है बुलडोज़र से।

बसंत त्रिपाठी
About the poet

बसंत त्रिपाठी

View profile & all 56 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like