टूटना एक सकर्मक क्रिया है

बजरंग बिश्नोईबजरंग बिश्नोई

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लो अब टूटता हूँ

टुकुर-टुकुर क्या देखते हो

दिखता नहीं है टूटना

पेड़ से फल टूटता है

ऐसे नहीं

आकाश से तारा टूटता है

ऐसे भी नहीं

प्रेम करने वालों का दिल टूटता है

ऐसे भी नहीं

हाथ से छूटकर गिरा

काँच का गिलास टूटता है

ऐसे भी नहीं

अब मुझे देखना

बंद भी करो

कुछ नहीं दिखाई देगा

न कोई आवाज़ चटकने की होगी

न टुकड़े बिखरेंगे

न पके फल की गंध पहुँचेगी तुम तक

न आकाश से गिरती हुई

फुलझड़ी बुझती दिखेगी

टूटता हूँ जैसे आदमी टूटता है

बिना किसी आवाज़ के

बिना आहट के

ऊपर से साबुत दिखते हुए

टूटा हुआ आदमी भी

टूटता है कई-कई बार

उसके टूटने की क्रिया

ध्वनिहीन और अदृश्य होती है

फिर भी संपूर्ण ब्रह्मांड में घटित होती है

टुकुर-टुकुर देखने की चीज़ नहीं है—

टूटना

बजरंग बिश्नोई
About the poet

बजरंग बिश्नोई

विलक्षण, किंतु अलक्षित कवि। ‘हरारत में तीसरी नदी’ प्रमुख कविता-संग्रह जन्म : 01/07/1944 | जालौन, उत्तर प्रदेश शिक्षा : एम. ए., कार्यक्षेत्र : उच्च शिक्षा योजना एवं प्रबंधन एवं हस्तनिर्मित काग़ज़ में शोध एवं विकास। रुचि-क्षेत्र : पेंटिंग एवं लेखन (कविता, कहानी…

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