संदेश

आलोक कुमार मिश्राआलोक कुमार मिश्रा10 Sept 1984

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हमेशा नदी से रखना

एक नम अपेक्षा

समय पड़ने पर पानी ही नहीं

स्मृतियों से भी तर कर देगी धार उसकी

पहाड़ से रखना एक दृढ़ लालसा

वह बूढ़े बाबा-सा हथेली पर रखेगा

मुलायम बर्फ़ के फाहे

ताज़ा हो जाओगे भीतर तक

उड़ते बादलों से भी बाँधना डोर

तरल उम्मीदों की

बरसें या न बरसें

भविष्य की हर तस्वीर में बहेगा उनका ही रंग

जंगलों से ज़रूर रखना रिश्ता

भय का नहीं अपनत्व का

फलेगा वो तुममें

जीवन की हज़ार नेमतें बनकर

मुँह मत मोड़ना रेगिस्तानों से कभी भी

नापना उसकी गर्म देह

उग आएगी तलवों में जिजीविषा की गहरी लकीर

चलते हुए उस पर

समुद्र देखकर नाव बाँध मत देना किनारे

वंचित रह जाओगे

कई तूफ़ानों की दोस्ती से

सबको नहीं मिलता लहरों का आमंत्रण

मिलना दुश्मनों से तो भी

रखना नज़रों में तल्ख़ी से अधिक प्रेम व करुणा

कोई गांधी बता गया है कि

इनसे ही मिटती है कटुता और मिलती है स्वतंत्रता।

आलोक कुमार मिश्रा
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आलोक कुमार मिश्रा

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