मैं तुमसे प्रेम करता हूँ

आलोक कुमार मिश्राआलोक कुमार मिश्रा10 Sept 1984

1 min read · 12.4K reads

मैं तुमसे प्रेम करता हूँ

इसका सबूत इससे बढ़कर क्या होगा कि

अब फूलों को बस निहारता हूँ

तोड़ता नहीं

मुझे बगिया अब तुम्हारे ही बालों का जूड़ा लगती है

मैं प्राची में उगते सूर्य को देख

भर जाता हूँ असीम ऊर्जा से

और पश्चिम में तुम्हारे घर की ओर

अस्त होने की कामना से

चल पड़ता हूँ दिन की सड़क पर

मुझे दिशाएँ इतनी खुली कभी नहीं लगीं कि

अब से पहले मतवाला बन

इतनी दूर-दूर तक नाच आता

आज ये मेरे मन की चौहद्दी बन गई हैं

मैं देख रहा हूँ फूट रहे

हर एक अंकुर को

और रीझ रहा हूँ

इनमें मुझे प्रेम दिख रहा है

उगते, बढ़ते और महकते हुए

लगता है मेरे प्रेम की हरियाली ढाँप लेगी

धरती का सारा खुरदुरापन

सुनो, तुम जो नहीं हो अभी मेरे पास

तो भी मैं अपनी उदासी ज़ाहिर नहीं कर रहा

मुझे पता है

प्रेम में जुदाई बरसों की हो सकती है

पर प्रेम बचा रहता है

किसी दूब की तरह।

आलोक कुमार मिश्रा
About the poet

आलोक कुमार मिश्रा

View profile & all 21 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like