Every Sher, In One Place
A whole poem in two lines — find one by topic, poet or first letter.
ज़िंदगी Sher
24 sher
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकलेबहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

ज़िंदगी है या कोई तूफ़ान हैहम तो इस जीने के हाथों मर चले

ज़िंदगी जब्र है और जब्र के आसार नहींहाए इस क़ैद को ज़ंजीर भी दरकार नहीं

ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीबमौत क्या है इन्हीं अज्ज़ा का परेशाँ होना

अब तो ख़ुशी का ग़म है न ग़म की ख़ुशी मुझेबे-हिस बना चुकी है बहुत ज़िंदगी मुझे

ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मींपाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है

देखा है ज़िंदगी को कुछ इतने क़रीब सेचेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से

ये चार दिन के तमाशे हैं आह दुनिया केरहा जहाँ में सिकंदर न और न जम बाक़ी

अपने मन में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़िंदगीतू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन

ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो हैक्यूँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम

हस्ती अपनी हबाब की सी हैये नुमाइश सराब की सी है

अमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भीये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है

तुम मोहब्बत को खेल कहते होहम ने बर्बाद ज़िंदगी कर ली

इस तरह ज़िंदगी ने दिया है हमारा साथजैसे कोई निबाह रहा हो रक़ीब से

मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गयाहर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होताडुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होनाआदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना

हम ग़म-ज़दा हैं लाएँ कहाँ से ख़ुशी के गीतदेंगे वही जो पाएँगे इस ज़िंदगी से हम

गर ज़िंदगी में मिल गए फिर इत्तिफ़ाक़ सेपूछेंगे अपना हाल तिरी बेबसी से हम

ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री 'ग़ालिब'हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे

क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैंमौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ

मिरी ज़िंदगी पे न मुस्कुरा मुझे ज़िंदगी का अलम नहींजिसे तेरे ग़म से हो वास्ता वो ख़िज़ाँ बहार से कम नहीं

किस दर्जा दिल-शिकन थे मोहब्बत के हादसेहम ज़िंदगी में फिर कोई अरमाँ न कर सके

है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम हैकहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है
