कभी-कभी तो जैसे वो अकड़ू बन जाती हैं,
और कभी हर बात पर बचकानी हरकत करती हैं,
कभी-कभी खुद हद से ज्यादा बेपरवाह हो जाती हैं,
और कभी मेरी लापरवाही पर खुद परेशान हो जाया करती हैं,
कभी-कभी गलतियों पर मेरी गुस्सा बड़ा हो जाती हैं,
और कभी मुझे मनाने की खातिर प्यारी - सी बातें करती हैं,
कभी-कभी मेरी तन्हा रातों की वो साथी बन जाती हैं,
और कभी दिन की धूप में वो साया बन मेरा हमसफ़र हुआ करती हैं,
कभी-कभी दिल की बातों को लबों पर लाकर वही रुक जाती हैं,
और कभी उसकी मुस्कान खुल कर दिल का हाल बयाँ करती हैं,
कभी-कभी छोटी बातों पर बेवज़ह के भाषण दे जाती हैं,
और कभी दिखलाती नही मगर इश्क़ मुझसे बेइंतेहा करती हैं।