बहुत दूर, कितना दूर होता है?
मानव कौल जी की किताब के इस शीर्षक ने,
मन में बड़ा ही व्याकुल करने वाला सवाल ला खड़ा किया।
कि आखिर.. बहुत दूर, कितना दूर होता है?
दो ईटों की बनी दीवार की मोटाई
या दो लोगों के बीच बनी खाई
तेरी मुझसे नाराजगी
या मेरी सदियों लम्बी खामोशी।
कि दरअसल होती क्या है ये दूरी
किसी की हज़ारो मील पैदल चलने की मजबूरी
या सरकार के राहत पैकेज की, कागज से यथार्थ तक की देरी
किसी भूखे बच्चे के हाथों में रोटी देख, उसकी देह त्यागती मां के मुस्कुराते होंठों के कोने
या फिर पिता का, उस बिन मां के बच्चे को लेकर
अपने गाँव तक का बचा हुआ सफर
बहुत दूर, आखिर कितना दूर होता है?
इस सवाल का सही उत्तर तो मुझे नहीं पता
बस इतना जानता हूँ कि मैं तुझसे इतना दूर तो नही जा सका,
जितना शासन जनता से दूर चला गया है।


