दहलीज़

 

पनपते ग़म के सैलाब को

छुपाने का मौसम है

खड़ी कर दी दीवार

मैंने आँसुओं के लिए

कि वो फिर लुढ़क कर

पलकों की दहलीज़ ना लांघे ।

 

        - सुधीर बडोला