युद्ध तुमने स्वयं चुना

इस बार भी पहल तुम्हारी थी

बताओ क्यूँ पहलगाम में

निर्दोषों को गोली मारी थी?


डाल मजहबी रंगों के छींटें

गुमराह करने की फ़िराक़ थी

फ़क़त नफ़रतों के बीज बोना

और मंशा तुम्हारी नापाक थी


चले सर कफ़न बाँधे ‘जवान ‘

संग खड़ी हिन्द की ये बेटियाँ

सैन्य बल की रहनुमाई जहाँ

करती व्योमिका और सोफ़िया ।


रोक ना पायेंगी सरहदें भी

इन हौसलों की उड़ान को

चल पड़ी है सेना जल नभ थल से

लौटाने सुर्ख ‘सिंदूर’ के सन्मान को ।


-सुधीर बडोला