दीवालों पर चिपके आइने,

छप्पर से छन कर आती रोशनी

मिट्टी की सोंधी खुशबू में,

यादों की लिपटी चाशनी

वो स्लेट , स्याही और कलम,

बेमतलब की यारी

तेल में सनी हुई बेतरतीब लटें,

उसपे मुस्कान प्यारी

सोचता हूँ ईश्वर भी वहीं था,

जब माँ आरती गाती थी

सारी दुनियाँ की खुशियाँ,

बस घर में ही मिल जाती थी

सुख - साधन में भी नींद नहीं,

कोई ख्वाब नहीं आते हैं

गोदी में जिसके चैन मिला था,

वो मिट्टी के घर याद आते हैं

-संजय सुमन