बहुत दूर तन्हाई में,

यादों की शहनाई में

आँसू से भरे दो नयनों को

सपने संजोते देखा है

उस चाँद को रोते देखा है


मिले शीतलता तप्त वसुधा को

उड़ेल रहा है अमित सुधा को

ना शिकवा कोई , गिला नहीं

उसको क्या खोना, जो मिला नहीं

फिर भी भींगे उस आँचल को,

स्वयं की सब खोते देखा है

उस चाँद को ...


भरी हैं आँखें , मुस्काते लब

दे दिया है धरती को सब,

खुश है सर्वस्व को अर्पण कर

अश्रुधारा का वर्षण कर

क्रमशः घटती काया लेकर

खत्म भी होते देखा है

उस चाँद को... - S. Suman