पीछे कोई शाया सा है , जो दिखता नहीं है
या फिर कोई डर है अनजाना सा जो सोने नहीं देता,
करवटें बदलते हैं की नींद हमें भी मुनासिब हो
पर कमबख्त ये अंदर का शोर है जो ये होने नहीं देता,
पर कोई सुन नहीं पाता है ये शोर शायद सब बहरे है-2,
चलो फिर लिख के बताता हूं की घाव कित्ते गहरे है,
स्याही मेरे कलम की अब खून बन जाएगी
हर एक शब्दों में चींख होगी नींद तुम्हे भी कहा आएगी,
रंजिशे चारो तरफ है हाथों में बस खूनी खंजर है
ढेर लाशों की हैं बिखरी पड़ी हर तरफ तबाही का मंजर है,
बिगड़े है हालात मुल्क के फैली बस लाचारी है
जो दंगो का ये मौसम है ये तेरी ही होशियारी है-2,
तुम कुर्सियों में बैठ सियासिती दाव खेले जा रहे हो
जिनकी पढ़ने की थी उम्र अभी उन्हें कातिल तुम्हीं बना रहे हो,
पर ना तुम बदलोगे ना ये बदलेंगे-2
बस ये हालात बिगड़ते जाएंगे
इस शहर की हर दीवारों पे हम बस खून के धब्बे पाएंगे।।
