स्त्री

करती हूँ मैं पूरी माँगे आपकी ,

लेती हूँ बलाएँ हरपल मैं सबकी ,

रखूँना उम्मीदें मैं किसी भी चीज़ की ,

नहीं करती परवाह मैं किसी भी चाह की ,

रखती हूँ ख़याल ख़ुशियों के सभीकी ,

तय्यारी रखती हूँ हर तूफ़ान से लढ़ने की ,

अँधेरे में भी रहती हूँ साथी बनकर मैं आपकी ,

सुनती हूँ सारी बातें मै आपके मन की ,

करती हूँ इज्जत हर एक इंसान की ,

देख नहीं सकती आँसू मैं आँखों में क़िसिकी ,

चुराकर आँसू लौटाती हूँ हँसी मैं लभों की ,

दूर करती हूँ हर मुश्किल मैं आपकी ,

दुनिया में रंग भरती हूँ मैं आपकी ,

परवाह करती हूँ मैं हर किसीके सोच की ,

कमियाबी का ताज सजाती हूँ सिर पर आपकी ,

अब तो करो इज्जत सभीने स्त्री की ।

साजिदा