समय
समय तू कैसी उल्झन है ,जल्दी से तू कटता ही नहीं ।
समस्या मेरी कम होने देगा या नहीं ।
रहम तो तुझे आता नहीं ,सुकून तो तू देगा नहीं ।
रफ़्तार ज़िंदगी की तूने रुका ही दी ।
तखदिर के ताले की चाबी तूने छुपा ही दी ।
आँसुओं की धारा तू रोकेगा या नहीं ।
चेहरे की हँसी तूने चुरा ही ली ।
अपनों का साथ जो मिलता था कभी, रुका दिया तूने वो सभी।
रास्ते तो बहोत है पर गाड़ी को चुरा लिया है तूने ।
चला देना अब ये रफ़्तार से गाड़ी ।
भगा देंगे हम अपने सपनों की गाड़ी ।
तेरे भरोसे तो रहते है हम ,सारे ग़म तू ही तो करेगा कम ।
साजिदा

